72वां स्वतंत्रता दिवस और आम आदमी के लिए आजादी के मायने - तहकीकात न्यूज़ | Tahkikat News |National

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Tuesday, 14 August 2018

72वां स्वतंत्रता दिवस और आम आदमी के लिए आजादी के मायने



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विश्वपति वर्मा (सौरभ)

एक बार फिर 15 अगस्त आने वाला है ,और इस बार भी  भारतीय नागरिक 72 वें स्वतंत्रता दिवस के नाम पर खूब जश्न मनाएंगे ,क्योंकि हिंदुस्तानियों को आजादी की "फीलिंग" होती है।

भ्रष्टाचार के मामले में भारत मे मुट्ठी भर लोग विधायिका और कार्यपालिका में  परचम लहराये हुए हैं ,वंही न्यायपालिका और मीडिया की भूमिका पर भी समय -समय पर सवाल खड़े हुए हैं लेकिन भारतीयों को 71 वर्षों के बाद तक देश मे कोई "बू" नही आती ।

राजपुरुष सत्ता की तिजोरी पाने और उस पर कब्जा जमाने के लिये किसी भी हद तक गिर जाने के लिए नाक कटाये बैठे हैं। अंग्रेजो के  शासन काल खण्डो में भारत पाकिस्तान एक था , मंदिर हिंदुओं के लिए और मस्जिद मुस्लिमों के लिए ही जाना जाता था, अब तो मंदिर में वोट और मस्जिद में आतंकी ही नजर आते हैं ।

आईएएस अधिकारी योजनाओं को लागू कराने की बजाय नेताओं के बंदन-अभिनन्दन में लगे हुए हैं ।
 अधिकारी गरीब के बच्चों के पेट पर लात मारकर खाद्य सुरक्षा अधिनियम,यूनिफार्म, मध्यान्ह भोजन योजना के पैंसे में सेंध लगाकर  अपने बच्चों के लिए खिलौना खरीद रहे हैं।

पुलिस विभाग की बात भी अनोखी है एक तरफ वह गुंडा मुक्त समाज की स्थापना करने की बात कहते  हुए बड़े-बड़े स्लोगन लगाती है ,दूसरी तरफ घूसखोरी और कालाबाजारी करने वाले लोगों के साथ बैठ कर वह मंच की शोभा बढ़ाती है ।वंही आम आदमी के साथ पुलिस का क्रूर व्यवहार खत्म नही हो रहा है।

 महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण योजना (मनरेगा) के पैंसों से तो अधिकारियों के घर मे एसी और प्रधानों के घर मे फ्रिज ,कूलर ही पंहुच पाई है।बाल पुष्टाहार योजना से तो केवल विभागीय लोगों के बेटी -बेटे ही कुपोषण से मुक्त हो पाये हैं।

देश की जनता के ऊपर टैक्स लगाकर सरकारों ने खूब पैंसे बटोरे ,लेकिन आपको पता होना चाहिए कि  जंहा देश के शिक्षण संस्थानों में साफ सफाई की कोई व्यवस्था नही है वंही सांसदों को कपड़े और पर्दा धुलवाने के लिए हर महीने 45 हजार रुपया  खजाने से  दिया जाता है।

परिषदीय स्कूलों की शैक्षणिक व्यवस्था और देख- रेख करने के बहाने शिक्षा विभाग में अभी तक बच्चों को सड़ा हुआ भोजन और फटा हुआ कपड़ा ही मिल पाया है ,परिषदीय विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों की स्थिति यह है कि उनके आईएएस ,पीसीएस बनने की बात छोड़ो उनमे अधिकारियों के चपरासी से बात करने की क्षमता भी पैदा नही हो रही है।

वंही उच्च शिक्षा के नाम पर देश के युवाओं को टेक्निकल जानकारी देने की बजाय उन्हें कालेज के कैम्पस में हिन्दू, मुस्लिम, गाय ,भैंस ,लव जिहाद ,जाति-धर्म  की भाषा सिखाने के लिए जवानी की दहलीज पर ही राजनीति का पाठ पढ़ाया जा रहा है।

जिसका परिणाम है कि देश मे 3.72 लाख भिखारी हैं जिनमे से 79 हजार भिखारी ऐसे हैं जो  हाईस्कूल ,इंटरमीडियट,स्नातक, परास्नातक की पढ़ाई करने के साथ डीग्रीधारक हैं और दिल्ली,मुम्बई, कोलकाता  बंगलुरु की सड़कों पर रोजगार न मिलने की वजह से भीख मांगने के लिए मजबूर हैं।

देश भर के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं को उपलब्ध कराने के नाम पर देश के खजाने से मनुष्य के स्वास्थ्य का हवाला देकर अब तक इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला किया गया है ।आप अपनी नंगी आंखों से देख सकते हैं कि 5 हजार से अधिक आबादी वाले गांवों में स्वास्थ्य केंद्र एवं उप केंद्र बनाए गए लेकिन देश की जनता का दुर्भाग्य है कि 82 फीसदी  अस्पतालों के दरवाजे आज तक नही खुले हैं,और अस्पतालों में सुबिधाओं की पंहुच दिखा कर प्रति वर्ष अरबो रुपये का चपत लगाया जा रहा है।

इसके अलावां देश मे भुखमरी की जटिल समस्या है, इससे निपटने के लिए 1975 में समेकित बाल विकास परियोजना शुरू की गई।लेकिन एसीएफ की रिपोर्ट बताती है कि 43 वर्ष बीत जाने के बाद भारत मे कुपोषण जितनी बड़ी समस्या है, वैसा पूरे दक्षिण एशिया में और कहीं देखने को नहीं मिला है।रिपोर्ट में लिखा गया है, "भारत में अनुसूचित जनजाति (28%), अनुसूचित जाति (21%), पिछड़ी जाति (20%) और ग्रामीण समुदाय के (21%) पर  कुपोषण का बहुत  बड़ा बोझ है।

स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रीशन इन द वर्ल्ड, 2017 की रिपोर्ट के अनुसार भारत मे सर्वाधिक 19 करोड़ लोग भूखे पेट सोने के लिए मजबूर हैं, वंही 5 साल से कम उम्र के 38 फीसदी बच्चे अति कुपोषित जिंदगी जीने के लिए विवश हैं।

खेल भी गजब का है सदन को चलाने के लिए  प्रति मिनट 2.50 लाख का खर्चा आता है वंही रिपोर्ट के अनुसार 30 रुपया प्रतिदिन कमाने वाला व्यक्ति अमीर है। सरकारी आंकड़ों में  शहर में 28.65 रुपये और गांवों में 22.24 रुपया कमाने वाला व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे आता है। क्या आपको लगता है कि यह राशि ऐसे देश में एक दिन के भी गुजारे के लिए काफी है जहा "शौच" करने के लिए 5₹ से लेकर 10₹ रुपये तक निर्धारित रेट है।बता दें कि भारत में 29.08 फीसदी लोग 22 रुपये से  कम पर गुजारा करते हैं ।

जरा सोचिए कि 70 वर्ष बीत जाने के बाद बहुसंख्यक आबादी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है तो यह कैसे माना जाए कि देश के लोग आजाद हैं ।हाँ यह सही है कि गोरे हुकुमत से भारत आजाद हो गया है लेकिन भूरे साहबों से देश की जनता को आजादी नही मिली है ।फिलहाल आप जश्न मनाइये कि हम आजाद हैं और अपनी जाति का सर्टिफिकेट मांगने की बजाय सरकार से मांग करो कि इतना सब होने के बाद भी वह हमें राष्ट्रवादी होने का सर्टिफिकेट  उपलब्ध करा दे जाति-धर्म का नही।

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