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Sunday, 23 August 2020

देश का सबसे बड़ा शिवलिंग होने का गौरव प्राप्त है पृथ्वीनाथ महादेव मंदिर को

राकेश सिंह गोण्डा 

देश का सबसे बड़ा शिवलिंग होने का गौरव प्राप्त है पृथ्वीनाथ महादेव मंदिर को

भगवान शिव का रूप-स्वरूप जितना विचित्र है, उतना ही आकर्षक भी। शिव जो धारण करते हैं, उनके भी बड़े ही व्यापक अर्थ हैं। जहां जटाएं शिव की जटाएं अंतरिक्ष का प्रतीक हैं तो वही चंद्रमा मन का प्रतीक है। शिव का मन चांद की तरह भोला, निर्मल, उज्ज्वल और जाग्रत है। त्रिनेत्र शिव की तीन आंखें हैं। इसीलिए इन्हें त्रिलोचन भी कहा जाता है, शिव की ये आंखें सत्व, रज, तम (तीन गुणों), भूत, वर्तमान, भविष्य (तीन कालों), स्वर्ग, मृत्यु पाताल (तीनों लोकों) का प्रतीक हैं।सर्पहार सर्प जैसा हिंसक जीव शिव के अधीन है। सर्प तमोगुणी व संहारक जीव है, जिसे शिव ने अपने वश में कर रखा है। त्रिशूल  शिव के हाथ में एक मारक शस्त्र है। त्रिशूल भौतिक, दैविक, आध्यात्मिक इन तीनों तापों को नष्ट करता है। तो वही डमरू शिव के एक हाथ में जिसे वह तांडव नृत्य करते समय बजाते हैं। डमरू का नाद ही ब्रह्मा रूप है। मुंडमाला  शिव के गले में है, जो इस बात का प्रतीक है कि शिव ने मृत्यु को भी वश में किया हुआ है। छाल शिव ने शरीर पर व्याघ्र चर्म यानी बाघ की खाल पहनी है जो व्याघ्र हिंसा और अहंकार का प्रतीक माना जाता है। इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा और अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा लिया है। शिव के शरीर पर भस्म लगी होती है। शिवलिंग का अभिषेक भी भस्म से किया जाता है। भस्म का लेप बताता है कि यह संसार नश्वर है। शिव का वाहन वृषभ यानी बैल है। वह हमेशा शिव के साथ रहता है जो धर्म का प्रतीक है। महादेव इस चार पैर वाले जानवर की सवारी करते हैं, जो बताता है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष उनकी कृपा से ही मिलते हैं। शिव-स्वरूप हमें बताता है कि उनका रूप विराट और अनंत है, महिमा अपरंपार है। उनमें ही सारी सृष्टि समाई हुई है।
कहा जाता है कि देवो के देव महादेव गोण्डा जनपद मुख्यालय से मात्र 30 किलोमीटर दूर प्राचीन समय की औद्योगिक नगरी कही जाने वाली खरगूपुर नगर से तीन किलोमीटर पश्चिमी छोर पर स्थित पृथ्वीनाथ मन्दिर एक ऐसा मन्दिर है, जिसमे स्थापित शिवलिग देश के विभिन्न मन्दिरो एंव प्राचीन शिवलिंगो से बड़ा है। पुरातत्वविदो की माने तो इतना प्रचीन एंव विशाल शिवलाट विश्व मे अन्यत्र कही भी नही है।पुराणो में उल्लेखित तथ्यो के अनुसार इस मन्दिर के शिवलिंग की स्थापना महाभारत काल मे अज्ञात वास के दौरान मध्य पाण्डव भीम ने की थी। प्राचीन समय मे यह क्षेत्र बनाच्छादित था। पुराणो में वर्णित अचिरावती नदी (जो अब राप्ती नदी) के पास नेपाल की दुर्गम पहाड़ियो मे स्थित महाराज विराट की राजधानी विराट नगर अब (कृष्णानगर नेपाल) मे अज्ञातवास किया था । अपने इस अज्ञात वास के दौरान पाण्डवो ने आगामी युद्ध में कौरवो पर विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से पंचारण्य क्षेत्र मे भगवान शिव की उपासना एंव अनुष्ठान किया था। 
इसी क्षेत्र में धर्मराज युधिष्ठिर ने सोमनाथ मन्दिर, अर्जुन ने पचरननाथ,  भीम ने पृथ्वीनाथ, एंव नकुल सहदेव ने अमत्र्यनाथ जो कि वर्तमान समय मे श्रावस्ती जनपद के इमरती गांव मे स्थापित किया था। पृथ्वीनाथ एंव पचरननाथ अगल बगल महज 200 मीटर की दूरी पर ही स्थित है। किवंदन्ती के अनुसार पचरन नाथ का शिवलाट जो जमीन मे समाया हुआ था। वहंा पर जुताई खुदाई के दौरान लगे फावड़े से खून की धार बह निकली जिस कारण अगल बगल खुदाई की गई तो वहंा पर विशाल शिवलाट दिखा। कालान्तर मे वहां मन्दिर की स्थापना कर दी गई। 
इसके साथ ही कालांतर मे खरगूपुर मे राजा देवीबक्श सिंह की अनुमति से यहां के निवासी पृथ्वी सिंह ने घर बनवाने के लिए खुदाई शुरु किया तो वहां से खून का फौव्वारा निकलने लगा जिसके कारण खुदाई बंद कर दी गई उसी रात मे पृथ्वी सिंह को स्वप्न मे यह पता चला कि नीचे सात खंडो का शिवलिंग दबा हैै। उन्हे एक खंड तक शिवलिंग खोदवाने का स्वप्न मे निर्देश दिया।  इसके बाद राजा ने शिवलिंग खोदवाकर पूजन शुरु करा दिया और उसके नाम पर इसका नाम पृथ्वीनाथ महादेव मंदिर पड़ गया।
पृथ्वीनाथ मन्दिर में स्थापित शिवलिंग कालेरंग की कसौटी पत्थर से निर्मित है। भगवान शिव का यह लाट जितना जमीन से ऊंचा है उससे कही अधिक जमीन से नीचे है। देखने में जमीन से ऊपर लगभग 60 फुट लम्बा शिवलाट है लगभग डेढ़ दशक पहले पूरातत्व विभाग ने इस स्थल की खुदाई प्रारम्भ की जिसमे गुप्त काल की कई महत्वपूर्ण अभिलेख व सामग्रिया मिली। 
  विडम्बना तो यह है कि अब इतना बड़ा महत्वपूर्ण मन्दिर होने के बावजूद अभी इसे पर्यटन स्थल का दर्जा तो दे दिया गया लेकिन इसके बावजूद यहां की बदहाली दूर करने की तरफ किसी का ध्यान नही गया। जिसके कारण सुदूर प्रदेशो व विदेशो में इस मन्दिर की ख्याति नही हो पा रही है। हांलाकि यहंा काफी दिनो पूर्व से ही यहां पर भगवान पृथ्वीनाथ महादेव का दर्शन करने दूर दराज व विदेशो से भी हिन्दू धर्मावलंबी बारहो महीने आते रहते है।

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