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Friday, 21 May 2021

आवश्यक दवाओं में कालाबाजारी--समाधान हाथ में, फिर सरकार संकोच में क्यों?



आवश्यक दवाओं में कालाबाजारी--समाधान हाथ में, फिर सरकार संकोच में क्यों?

प्रोफेसर आर पी सिंह
सदस्य, 
प्राउटिष्ट फोरम एवं प्रगतिशील भोजपुरी समाज 
E-mail: rp_singh20@rediffmail.com
        Contact:  9935541965

इस कोविडकाल में मानवीय मूल्यों को ताकपर रखकर आवश्यक दवाओं, सेवाओं तथा ऑक्सीज़न सिलिंडर जैसे उपकरणो की भारी कालाबाजारी और जमाखोरी अपने देश में बारंबार हर मौके पर देखी जाती रही है। तमाम आर्थिक सुधारों के बावजूद यह स्थिति स्वास्थ्य क्षेत्र में आज तक बनी रही है--यह हैरानी कि बात है। कोरोना और ब्लैक फंगस के इलाज के मामलों में तो  कालाबाजारी और जमाखोरी हैवानियत और निर्दयता की सारी सीमाएं लांघ चुकी है। इसके लिए लोगों के पास धांधलेबाजों को कोसने के अलावा कोई चारा नहीं। पर यह स्थिति ऐसे ही नहीं बनीं हुई है। फार्मा कंपनियों की लॉबी का आज़ादी के समय से ही सरकारों और विशेषज्ञों पर दबाव ऐसी स्थिति को बनाए रखता रहा है। वर्तमान अच्छे दिनों वाली व्यवस्था इसका अपवाद साबित नहीं हो पायी है। निम्न तथ्यों पर गौर करें जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस स्थिति को बनाए रखने में सहायक रही है:   
हम देख रहे हैं कि अपनी दूसरी लहर में कोरोना ग्रामीणों के लिए और अधिक घातक साबित हो रहा है--इसने कई इलाकों में लाशों का अंबार लगाया। कई दशकों से  बात उठती रही है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बेची गई दवाएं लगभग ८०% नकली हैं और आपात स्थिति में काम नहीं करती हैं । ऐसी दवाएं वास्तव में नकली और घटिया फार्मा उत्पादकों व विक्रेताओं द्वारा हत्या के हथियार हैं। यह ग्रामीण क्षेत्रों में पहले भी महामारी फैलने का एकबड़ा कारण रहा है जिससे भारी जनहानि होती रही है । पहले भी प्लेग, चेचक, पोलियो, मलेरिया जैसे बड़े प्रकोपों व महामारियों के शिकार अधिकांशतः गाँव के लोग ही होते रहे हैं बावजूद स्वच्छ और हरित वातावरण के।  लेकिन दवाओं के इन नकली निर्माताओं के सत्ता धारकों के साथ मजबूत कनेक्शन रहे हैं। इसलिए  लोकप्रिय मीडिया द्वारा प्रायः इस दुरभिसंधि पर फोकस नहीं किया जाता।
ब्रांड नाम से दवाओं की आपूर्ति भारतीय फार्मा कंपनियों द्वारा भ्रम और लूट का एक बड़ा स्रोत है--यह मुद्दा पहले भी कई बार उठाया जा चुका है। ब्रिटेन जैसे पश्चिमी देशों में जेनेरिक नामों से दवाओं की आपूर्ति की नितांत सरल व्यवस्था रही है, पर भारत की कम जागरूक जनता के लिए ब्रांड नाम से दवाओं की आपूर्ति की बेहद जटिल व्यवस्था क्यों चलने दी जा रही है आज़ादी के समय से आजतक?--यह विचारणीय विषय है। लंबे समय से एक ही साल्ट की दवा अलग-अलग ब्रांड नामों से बेची जाती है पूरे कानूनी समर्थन से, जबकि पाश्चात्य देशों में दवाएं जेनेरिक नाम से ही बेची जा सकती हैं। आमजन के जीवन से जुड़ी कानूनी व्यवस्था आजतक नहीं बदली।  
हाल में कीमतों में कमी के बाद भी एक ही साइज और किस्म की रेमडिकिविर की एक शीशी कैडिला की कीमत 800 रुपये और अन्य कंपनियों द्वारा 3000-4000 रुपये में होती है--क्या यह सरकार के समर्थन से गजब का खेल नहीं है? वह भी ऐसी दवा जिसके बारे मेँ विश्व स्वास्थ्य संगठन  का कहना है कि रेमडिसिवर जीवन रक्षक दवा के रूप में बेकार है । सरकारी संत रामदेव इसे इबोला का जहर मानते हैं। सरकारी वैज्ञानिक डा0 रणदीप गुलेरिया  भी इसे परीक्षण में बेकार मानते हैं। इस दवा के लिए मेडिकल प्रोटोकाल के तहत ही इतना हाईप क्यों पैदा किया गया? इन सारी बातों से क्या दुनिया के सबसे महान लोकतन्त्र का भारतीय दावा खोखला नहीं साबित होता? इन मुद्दों को  हमेशा सत्तासीनों और गोदी मीडिया द्वाराअच्छी तरह से दबाया जाता रहा है। यहाँ सिर्फ कालाबाजारी और जमाखोरी में लिप्तों को कोसना और सतही कारवाई समाधान नहीं है। जनता की नासमझी को कोसने की प्रवृत्ति भी मतदाताओं के साथ विश्वासघात ही है। स्वास्थ्य राज्य का विषय कहकर टालना ठीक है क्या?  ऊपर इंगित बातों को लेकर फार्मा कंपनियों पर ब्रिटेन जैसे पश्चिमी देश अंकुश लगा सकते हैं तो इस महान लोकतन्त्र में सर्वहित मेँ ऐसे समुचित कदम स्पष्ट बहुमत की सरकार तत्काल क्यों नहीं उठाती? आखिर कृषि सुधारों के तहत कंपनियों को लाभ पहुँचाने वाले तीन-तीन बिल आनन-फानन में पास किए गए थे कि नहीं? भारत  के राष्ट्रवादी क्या सिर्फ इतिहासी समोसे के आलू छीलने के लिए हैं?   
वास्तविक राजव्यवस्था को दवा और आवश्यक उपकरणों के क्षेत्र में इन अपेक्षित सुधारों हेतु उपलब्ध अवसर से चूकना नहीं  चाहिए। यदि फार्मा कंपनियां इन सुधारों के विरोध का रवैया अपनाती हैं तो इनके पेटेंट अधिकार दस वर्षों के लिए  छीनकर घरेलू उत्पादकों में वितरित कर इन्हें देश से भगा देना चाहिए।
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