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Tuesday, 13 July 2021

भगवान जगन्नाथ का दर्शन-पूजन करने में लोगो की हुयी फजीहत

कैलाश सिंह विकास वाराणसी

भगवान जगन्नाथ का दर्शन-पूजन करने में लोगो की हुयी फजीहत

जगन्नाथ मंदिर ट्रस्ट ने मंदिर जाने वाले रास्ते पर लगाया ताला

वाराणसी,12  जुलाई।  भगवान शंकर की नगरी काशी में 36 करोड़ देवी देवता वि•भीन्न स्वरूपों में निवास करते है।  शिव पुराण व काशी पुराण सहित धर्मग्रंथो में वर्णन है कि जब भगवान शंकर काशी में निवास करने के लिए कैलाश पर्वत से चले तो सभी देवी देवता दुखी हो गये और भगवान शंकर से काशी में बसने की प्रार्थना की तब भगवान शंकर ने सभी देवी देवताओं को आशीवार्द दिया कि आप सभी  काशी में निवास करिए और वहां रहने वाले भक्तों को दर्शन देकर उनका कल्याण करिए।  ठीक उसी तरह से जगन्नाथ पुरी में विराजमान परमब्रम्ह भगवान जगन्नाथ का भी विग्रह काशी में भगवान जगन्नाथ की आशीवार्द से पुरी के पुजारी द्वारा काशी में स्थापित किया गयी। काशी के संभ्रांत  परिवार शापुरी परिवार के सहयोग से।  काशी में भगवान जगन्नाथ की उसी परम्परा से पूजन-अर्चन होता है जैसा कि पुरी के जगन्नाथ मंदिर में होता है। लेकिन इधर बीच दो वर्ष से काशी की जीवंत परम्परा को नष्ट करने की चेष्टा की जा रही है, उसमें से एक बहुत बड़ा कारण कोरोना का संक्रमण रहा है तथा दूसरा जगन्नाथ मंदिर का देखरेख का जिम्मा संभाल रहे जगन्नाथ मंदिर ट्रस्ट परिवार का रहा है।  कोरोना के संक्रमण के पहले वर्ष भी भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा नहीं निकली और इस बार भी रथयात्रा नहीं निकालने का कारण कोरोना ही बना लेकिन शापुरी परिवार द्वारा रथयात्रा निकालने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया।  एक पखवारे पूर्व जब भगवान का जला•भीषेक होने वाला था तो शापुरी परिवार द्वारा प्रेसनोट जारी करके बताया गया कि इस बार भी सबकुछ सांकेतिक ही होगा।  
मंदिर जाने वाले रास्ते के दरवाजे पर लगा ताला
भगवान का जला•भीषेक सांकेतिक रूप से भक्तों ने किया उसके बाद जब भगवान बीमार पड़ तो उनको एक पखवारे तक काढ़े का भौग लगता है, ये प्रसाद के रूप में सभी को मिलता है उससे भी आम भक्तों को वंचित कर दिया गया।  उसके बाद एक पखवारे बाद जब भगवान स्वस्थ्य हुए तो भक्तों के दर्शन पूजन में भी बाधा डाला गया।  मंदिर में जाने वाले रास्ते पर ताला चढ़ा दिया गया, जिससे भक्तों को घूम कर जगन्नाथ गली से होकर दर्शन पूजन करने के लिए जाना पड़ा।  इससे भक्तों को काफी परेशानी हुयी। समाजसेवी रामयश मिश्र ने कहा कि आज भगवान के भक्तों को दर्शन-पूजन करने में काफी असुविधा हुयी, जो आसपास के थे वो तो दूसरे रास्ते से जाकर दर्शन-पूजन कर लिये लेकिन जो बाहर थी, उसकी काफी परेशानी हुयी।  बहुत लोग तो दर्शन भी नहीं कर पाये। इसके लिये कौन जिम्मेदार है।
बावन बीघे का है पूरा परिसर
रामयश मिश्र ने बताया कि भगवान जगन्नाथ मंदिर का परिसर 52 बीघे में फैला हुआ।  मंदिर में दर्शन पूजन करने के लिए श्रद्धालु अस्सी घाट की तरफ से मंदिर में एक छोटे द्वारा से प्रवेश करते है और छोटे बड़े चार द्वार पार कर भगवान के चरणों में पहुंचते और दर्शन पूजन करते है।  इन चारो दरवाजों का भी बहुत ही पौराणिक महत्व है।  भगवान जगन्नाथ का दर्शन पूजन करने की यही परम्परा है।  आज जिस रास्ते से लोग मंदिर में दर्शन पूजन के लिए जा रहे है उस रास्ते से भगवान की डोली यात्रा निकलती है।  बाकी दिनों में वह मंदिर के पीछे के इस रास्ते से होकर मंदिर में दर्शन पूजन करने के लिए आते है।
सांकेतिक रथयात्रा तो हो सकती थी
लगभग चार सौ वर्ष से भगवान जगन्नाथ की डोली यात्रा मंदिर से निकल कर रथयात्रा जाती है और वहां विशाल मेला लगता था, काशी के लक्खा मेला की शुरूआत भगवान जगन्नाथ के रथयात्रा मेला से होती है लेकिन विगत दो वषों से कोरोना के कारण काशी की यह परम्परा रूक गयी है। रामयश मिश्र ने कहा कि अगर शापुरी परिवार और जिला प्रशासन के लोग चाहते तो यह परम्परा रूकती नहीं और भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा सांकेतिक निकल सकती थी, जैसे की पुरी में निकल रहा है।  खुद भगवान जगन्नाथ का परिसर इतना बड़ा है कि इसमें ही भगवान जगन्नाथ का सांकेतिक रथयात्रा हो सकता था लेकिन काशी के इस जीवित परम्परा को बचाने का प्रयास किसी ने नहीं किया।  न तो काशी के विद्वतजनों ने ही यहां के संतो महंतो ने इस पर विचार किया, जिस लोगो पर मंदिर परिसर की देखरेख का जिम्मा है वह खुद ही आगे नहीं आये बाकी सबकी बात ही छोड़ दीजिए।
भगवान जगन्नाथ का हुआ दर्शन-पूजन
आषाढ़ माह के शुल्ल पक्ष की तृतीया को भगवान जगन्नाथ भक्तों को दर्शन देकर रथयात्रा के लिए निकलते है लेकिन इस बार कोरोना के संक्रमण के कारण रथयात्रा नहीं निकल सकी।  प्रात: मंदिर के पुजारी राधेश्याम पाण्डेय ने भगवान जगन्नाथ, सुभाद्रा और वलभद्र को पीताम्बरी धारण कराकर विविध फूलों से श्रृंगार कर पूड़ी सब्जी, हलुआ व मौसमी फलों का भौ लगाकर भव्य आरती की।  भगवान के श्रृंगार रूप का दर्शन पूजन करने के लिए भक्तों की सुबह से ही आने का सिलसिला शुरू हो गया जो सायंकाल तक चला। भवदीय

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