चीनी के बढ़ते दाम ने आम उपभोक्ताओं के घरेलू बजट पर दबाव बढ़ा दिया है। देश के कई बाजारों में चीनी की कीमतों में पिछले कुछ सप्ताह में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे सिर्फ एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने और चीनी के इस्तेमाल को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। कम उत्पादन, प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में मौसम की प्रतिकूल स्थिति, शुरुआती स्टॉक में कमी और आगामी त्योहारों के कारण बढ़ने वाली मांग ने भी बाजार पर दबाव बढ़ाया है।
एथेनॉल नीति भी इस पूरे समीकरण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। केंद्र सरकार पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण को बढ़ावा दे रही है और 2025-26 के एथेनॉल सप्लाई वर्ष में 20 प्रतिशत मिश्रण का लक्ष्य रखा गया था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण 19.24 प्रतिशत तक पहुंच चुका था। चीनी क्षेत्र से एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के डायवर्जन की मात्रा भी महत्वपूर्ण रही है।
उद्योग से जुड़े आंकड़ों के अनुसार मौजूदा वर्ष में करीब 30 लाख टन चीनी एथेनॉल उत्पादन की ओर डायवर्ट हुई है, जो कुल उत्पादन का लगभग 10 प्रतिशत है। इसी कारण सरकार अब अगले चीनी सत्र में एथेनॉल के लिए गन्ने के इस्तेमाल को सीमित करने पर विचार कर रही है, ताकि घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाई जा सके।
कम उत्पादन और त्योहारों की मांग भी बड़ी वजह
चीनी की कीमतों में तेजी का दूसरा बड़ा कारण उत्पादन और उपलब्धता से जुड़ा है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में कम बारिश की स्थिति ने आगामी उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ाई है। वहीं अगस्त से नवंबर के बीच गणेश चतुर्थी, दशहरा और दीपावली जैसे त्योहारों के कारण मिठाइयों और अन्य खाद्य पदार्थों में चीनी की मांग बढ़ने की संभावना रहती है। ऐसे में सीमित आपूर्ति के बीच मांग बढ़ने से कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बन रहा है।
सरकार ने उठाए तत्काल कदम
बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार ने 20 अगस्त को 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। यह कदम घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ाने और कीमतों पर दबाव कम करने के उद्देश्य से उठाया गया है। इसके साथ ही थोक उपभोक्ताओं के लिए चीनी का स्टॉक रखने की सीमा भी कम की गई है, ताकि बड़े खरीदार अत्यधिक मात्रा में चीनी जमा न कर सकें।
मिठाई कारोबार पर पड़ सकता है सीधा असर
चीनी के दाम बढ़ने का असर केवल घरों की रसोई तक सीमित नहीं है। मिठाई, बेकरी, चाय-नाश्ता और पेय पदार्थ बनाने वाले कारोबारियों की लागत भी बढ़ती है। त्योहारों के दौरान यदि चीनी के दाम ऊंचे बने रहते हैं तो इसका असर मिठाइयों की कीमतों पर पड़ सकता है। कारोबारियों के सामने लागत बढ़ने और ग्राहकों पर अतिरिक्त बोझ डालने के बीच संतुलन बनाने की चुनौती होगी।
विशेषज्ञों के अनुसार तस्वीर एकतरफा नहीं
चीनी बाजार की मौजूदा स्थिति को केवल एथेनॉल नीति का परिणाम मानना सही नहीं होगा। एथेनॉल के लिए चीनी और गन्ने का डायवर्जन निश्चित रूप से उपलब्धता को प्रभावित करने वाला एक कारक है, लेकिन उत्पादन में कमी, मौसम, शुरुआती स्टॉक और त्योहारों की मांग जैसे कारण भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। सरकार का हालिया आयात निर्णय और एथेनॉल के लिए गन्ने के इस्तेमाल की समीक्षा इस बात का संकेत है कि चीनी की उपलब्धता और ईंधन नीति के बीच संतुलन बनाने की चुनौती अब सामने है।
स्थानीय बाजार में वास्तविक कीमत की जांच जरूरी
मोतीराम अड्डा और आसपास के बाजारों में चीनी की खुदरा कीमत कितनी है, इसे प्रकाशित करने से पहले स्थानीय किराना कारोबारियों, थोक विक्रेताओं और उपभोक्ता मूल्य की प्रत्यक्ष पुष्टि करना अधिक पारदर्शी होगा। इससे राष्ट्रीय बाजार के आंकड़ों और स्थानीय बाजार की वास्तविक कीमत के बीच अंतर भी स्पष्ट किया जा सकेगा।
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