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Saturday, 14 April 2018

समानतावादी समाज देने के बाद भी भारत के भविष्य पर संकट



लेखक-रामकरन 

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में दो घटनाएं घटित हुई । एक दक्षिण अफ्रीका में , दूसरा भारत में। दक्षिण अफ्रीका में मोहनदास करमचंद गांधी जी के पास फर्स्ट क्लास का टिकट होने के बावजूद ट्रेन से जबरन उतार दिया। दूसरी घटना दो बालको के साथ भारत में हुई। जब एक बैलगाड़ी वाले ने इन्हें लिफ्ट दिया किंतु जैसे ही उसे पता चला कि वे अमुक जाति के है, तो उसने उन्हें कड़े शब्द , अपशब्द कहते हुए नीचे उतार दिया। धक्का इसलिए नही दिया क्योंकि अछूत को छू जाने का डर था। दक्षिण अफ्रीका की घटना गांधी जी को अप्रत्याशित लगी और बहुत बड़े बदलाव का कारण बनी। कारण यह था कि गांधी जी को यह नस्लवाद लगा और उन्हें लगा कि मनुष्य में भेद करना सर्वथा अनुचित है। 

दूसरी तरफ भारत की घटना कोई विशेष चर्चित नही हुई । इसकी वजह यह थी कि यह एक सामान्य सी घटना थी जो इस देश में दैनिक थी और धर्म-जाति व्यवस्था से उत्प्रेरित थी। 

नस्लवाद का लगभग उन्मूलन हो गया। किन्तु जातिवाद का नही। सम्भवतः इसका कारण यह है कि नस्लवाद को लोगों ने वैश्विक अमानवीय समस्या माना और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर इसे चर्चा में शामिल किया गया। परन्तु जातिवाद की समस्या को लोगो ने, गांधी ने भी आंतरिक समस्या माना और इस मुद्दे पर कभी खुलकर चर्चा नही करने दिया। 

परिणाम यह हुआ कि जातिवाद है एवं इसमें कोई उल्लेखनीय सुधार नही हो पाया है, कुछ चर्चाओं की सीमा छोड़ कर। जाति उच्छेदन का सपना देखने वाले ने समता -समानता वादी समाज देने की कोशिश की, पर वह अभी भी बहस का हिस्सा बना है। यह भारत के भविष्य के लिये अभी भी संकट बना है। 

अब जरूरत यह है कि इससे निपटने के लिए ठोस कदम उठाये जाएं ,राजनीतिक लाभ के खातिर महापुरुषों के सिद्धांतों का पतन न किया जाए ।जातीय भेदभाव के तौर पर महापुरुषों के विचारों की हत्या करने की बजाय सत्ताधारी वर्ग को चाहिए कि वें इनके विचारों का पूल बनाकर समता, स्वतंत्रता, बंधुता एवं न्यायधारित समाज की स्थापना करें तब भारत के भविष्य का सुगम निर्माण सम्भव है।

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