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Tuesday, 25 September 2018

कानपुर--पूर्वजों को पानी देने के लिए घाटों पर लगा परिजनों का तांता- शुरू हुए पितृ पक्ष

जिला संवाददाता-- रवि तहकीकात न्यूज़ 
 
 
पितृ पक्ष के प्रतिपदा का श्राद्ध आज से शुरू हो गए हैं जहां सरसैया घाट समेत शहर के तमाम घाटों पर तर्पण और पिंडदान के लिए लोग भारी संख्या में एकत्रित हुए और अपने पितरों को पानी दिया और उनका तर्पण किया।घाटों पर कर्मकांड के अलावा दान पुण्य भी किया गया ।
पितृपक्ष के शुरू होते ही शहर के सभी घाटों पर अपने पितरों को पानी देने के लिये सुबह से ही परिजनों की भीड़ एकत्रित हो गयी थी शहर के सरसैया घाट, मैस्कर घाट, सिद्धनाथ घाट समेत तमाम घाटों पर तर्पण करने आये लोगों की भीड़ पहुंच गई। तर्पण करने के लिए पुरोहितों ने रीतिरिवाजों के साथ लोगों को पूजा करवाई। जहां तर्पण करने आए लोगों ने हाथों में कुशा पहनकर अपने पितरों को पानी दिया। हिन्दू धर्म में मृत्यु के बाद श्राद्ध करना बेहद जरूरी माना जाता है। मान्यतानुसार अगर किसी मनुष्य का विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण ना किया जाए तो उसे इस लोक से मुक्ति नहीं मिलती और वह भूत के रूप में इस संसार में ही रह जाता है। 

 
 
 
रीतिरिवाजों के साथ किया तर्पण

शहर के सरसैया घाट में सुबह से ही लोग अपने पितरों को पानी देने के लिए दिखाई पड़ने लगे जिसके चलते घाटों में लोगों को खासा भीड़ दिखाई दे रही थी वहीं लोग हिन्दू धर्म के अनुसार धोती और जनेऊ पहनकर अपने पितरों को पानी देते हुए दिखाई दिए।
तर्पण करने आये निनिध बाजपेई ने बताया कि हम यहां पर अपने माता पिता को पितृपक्ष के मौके पर पानी देने आये हैं यह पितृ पक्ष को लोग भगवान राम के जमाने से मानते चले आ रहे है पितृ पक्ष की मान्यता है कि अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए लोग 15 दिन अपने पितरों को पानी देते है इस दौरान ब्राह्मणों को भोजन भी कराया जाता है जिससे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है हम यहां कई वर्षों से अपने पितरों को पानी देने यहां आते हैं
 
 
 
पुरोहित कुशल द्विवेदी ने बताया कि पितृ पक्ष में यहां तर्पण का कार्य पिछले 12 वर्षों से करा रहे हैं इसमें पितरों को पानी दिया जाता है उसके साथ तिल और कुशा का विशेष महत्व होता है
ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार देवताओं को प्रसन्न करने से पहले मनुष्य को अपने पितरों यानि पूर्वजों को प्रसन्न करना चाहिए। हिन्दू ज्योतिष के अनुसार भी पितृ दोष को सबसे जटिल कुंडली दोषों में से एक माना जाता है। पितरों की शांति के लिए हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक के काल को पितृ पक्ष श्राद्ध होते हैं। मान्यता है कि इस दौरान कुछ समय के लिए यमराज पितरों को आजाद कर देते हैं ताकि वह अपने परिजनों से श्राद्ध ग्रहण कर सकें।
ब्रह्म पुराण के अनुसार जो भी वस्तु उचित काल या स्थान पर पितरों के नाम उचित विधि द्वारा ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक दिया जाए वह श्राद्ध कहलाता है। श्राद्ध के माध्यम से पितरों को तृप्ति के लिए भोजन पहुंचाया जाता है। पिण्ड रूप में पितरों को दिया गया भोजन श्राद्ध का अहम हिस्सा होता है।

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