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Friday, 28 September 2018

नशा बाटने वाले सौदागर की औलाद की मौत जब नशे की वजह से होती है,

तहकीकात न्यूज़ डेस्क  

आप जैसा बीज बोओगे, वैसा ही फल पाओगे। अगर कोई बुरा कर्म करता है, तो बुरा ही भोगता है। यही संदेश नाटक 'सौदागर' ने दिया। वीरवार को पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के पाल ऑडिटोरियम में नाट्यम बठिंडा की ओर से मंचित किए गए इस नाटक में समाज में फैली नशे की बीमारी को दिखाया गया है।

नाटक में दिखाया गया कि लोगों को नशा बाटने वाले सौदागर की औलाद की मौत जब नशे की वजह से होती है, तो उस पर क्या बीतती है। नाटक तेरह पात्रों के इर्द-गिर्द रहता है। नाटक में नशा बेचने वाले सौदागर का किरदार डॉ. जगदीप सिंह, सौदागर के बेटे दीपा का किरदार हैप्पी प्रिंस, नशा बेचने वाले एजेंट पहलवान का किरदार गगनदीप सिंह, नशेड़ी लड़कों के किरदार में सिकंदर सिंह, आशीष पंडित व हरमन, जटा अमली के किरदार में शमिंदर सन्नी, जागर अमली के किरदार में रंग हरमिंदर सिंह, क्रांतिकारी नौजवान के किरदार में हरजोत गोलेवालिया व हरजीत सिंह, उजागर अमली की घरवाली के किरदार में आस्मिता बजाज, पुलिस इंस्पेक्टर के किरदार में रंग हरजिंदर सिंह व सरपंच के किरदार में हरजोत नटराज रहे। जबकि ऑफ स्टेज में सुरिंदर कौर व गुरनूर सिंह रहे।




नाटक में यह दिखाया गया कि पांच दरियाओं की धरती पर नशे का छठा दरिया बह रहा है। इसके पीछे ज्यादातर रसूखदार लोग होते हैं। जो ज्यादा से ज्यादा पैसा बनाने के लिए दूसरों के घरों के चिराग व सुहाग को नशे की लत में लगाकर बर्बाद कर देते हैं। नाटक में बताया गया कि किस तरह नशे का व्यापार करने वाला सौदागर सिंह एजेंट पहलवान सिंह के जरिए गांव के लड़कों को फ्री में नशा देता है। जब लड़के नशे के आदी हो जाते हैं, तो वे एजेंट से नशा लेने के लिए घर में चोरी, सड़क पर लूटपाट करते हैं। इसी एजेंट की वजह से चंडीगढ़ में पढ़ रहा सौदागर सिंह का बेटा दीपा भी स्मैक के नशे का आदी हो जाता है।

सौदागर सिंह को एजेंट जब यह बताता है कि अब उनका धंधा गांव से निकल कर चंडीगढ़ तक पहुंच गया है, तो वह बड़ा खुश होता है। वह इस बात से पूरी तरह से अनजान होता है कि एजेंट उसके बेटे को ही नशा सप्लाई कर रहा होता है। उधर दीपा पूरी तरह से नशे की दलदल में फंस चुका होता है। एक दिन वह नशा करके यूनिवर्सिटी से घर के लिए निकलता है। रास्ते में नशे की ओवरडोज की वजह से उसका एक्सीडेंट हो जाता है। जब यह बात सौदागर सिंह को पता चलती है, तो वह अस्पताल में पहुंचता है। वहां पुलिस उसे बताती है कि उसके बेटे की मौत नशे की वजह से हुई। बेटे की लाथ हाथों में देख बोला, सौदागर, मेरे कर्मो की सजा बेटे को मिली

नाटक के आखिरी दृश्य में सौदागर सिंह के एक हाथ में नोटों की गड्डी और दूसरे हाथ में पुत्र की लाश होती है। तभी पहलवान एजेंट भी वहां पहुंच जाता है। लाश देखकर वह सौदागर सिंह से कहता है कि यह तो वहीं लड़का है, जिसे वह चंडीगढ़ में नशा सप्लाई करता था। यह सुनकर सौदागर फूट फूट कर रोने लगता है। कहता है कि मेरे कर्मो की सजा मेरे बेटे को भुगतनी पड़ी। अगर मैं नशा बांटने वाला सौदागर न होता तो आज मेरा बेटा जिंदा होता। इतना कहकर वह बेटे की लाश से लिपट कर रोने लगता है।


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