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Monday, 8 October 2018

दिल्ली में आर्थिक लोकतंत्र पर सेमिनार का आयोजन, पूंजीपतियो द्वारा देश को खोखला करने का खुलासा

 

 
मीडिया डेस्क -कृपा शंकर चौधरी

दिल्ली - जब से देश आजाद हुआ देश ने कई सरकार देखा और सरकार से अपेक्षा रहा कि अबकी बार जनता के लिए कुछ निर्णायक कदम उठाए जाएंगे किन्तु हर सरकार वहीं ढाक के तीन पात मुहावरे पर चलती रही। सरकार और पूंजीपतियों के इस भाईचारे से देश इतना खोखला होता गया कि अब उसे अपने पैरों पर खड़ा होना मुश्किल है। पूंजीपतियों द्वारा ऐसा जाल बिछाया गया कि अब सरकार भी इनके सामने घुटने टेक दिए हैं।
 
प्राउटिस्ट फोरम" के तत्त्वाधान में कल दिनांक 7 अक्टूबर, 2018 को दीनदयाल उपध्याय मार्ग, नई दिल्ली स्थित नेहरू युवा केन्द्र में प्रउत के "आर्थिक लोकतंत्र" की अवधारणा पर बुद्धिजीवियों और समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों के बीच एक सार्थक संवाद हुआ। इस कार्यक्रम में समाज के विभिन्न वर्गों के 120 से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया।

इस अवसर पर प्रउत की आर्थिक अवधारणा को रखते हुए राजेश सिंह ने जहां एक तरफ भारत में गरीबी और कुपोषण में रह रहे लोगों के विषय मे विभिन्न संस्थाओं द्वारा जारी आंकड़ों के माध्यम से लोगों का ध्यान आकृष्ट किया, वहीं दूसरी तरफ कुछ लोगों के हाथ मे असीमित सम्पदा का हवाला देते हुए अमीरी-गरीबी के बीच बढती खाई का सजीव चित्रण किया। दूसरी तरफ यह भी बताया कि जनता के द्वारा चुनी हुई सरकार कैसे आम जनता के हितों की अनदेखी तथा सिर्फ और सिर्फ पूंजीपतियों के लिए काम करती है।

प्रउत के आर्थिक लोकतंत्र के चार स्तंभ- "न्यूनतम आवश्यकताओं की गारंटी, बढती क्रय क्षमता, आर्थिक निर्णय का अधिकार सिर्फ स्थानीय लोगों को हो और बाहरी व्यक्तियों का किसी समाज विशेष के आर्थिक मामलों में हस्तक्षेप बिल्कुल स्वीकार्य नही है" की बृहत व्याख्या की, जिसका की उपस्थित लोगों ने गर्मजोशी से स्वागत किया

प्रउत की ओर से बोलते हुए, अंतरंग आनंद योगीजी ने समाज, विशेष सामाजिक आर्थिक वर्गीकरण और स्थानीय तथा बाहरी व्यक्ति को परिभाषित किया।
 

प्रउत के आखिरी वक्ता के तौर पर बोलते हुए निरंजन कुमारजी ने बताया कि आर्थिक लोकतंत्र का रास्ता विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था के माध्यम से गुजरता है। साथ ही यह भी बताया कि कृषि, उद्योग, कोआपरेटिव (सहकारिता) और व्यक्तिगत स्वामित्व में छोटे या कुटीर उद्योग के माध्यम से कैसे सभी को रोजगार दिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि अगर विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था को अपनाकर आर्थिक लोकतंत्र को स्थापित कर लिया जाय तो सभी की न्यूनयम आवश्यकताओं की पूर्ति होगी, सबों के पास रोजगार होगा और कोई भी किसी का आर्थिक और सामाजिक शोषण नही कर पायेगा।

प्रउत वक्ता के तौर पर बोलते हुए दिल्ली यूनिवर्सिटी में कार्यरत अर्थशास्त्र विषय के सहायक प्रोफेसर डॉ. यशराज आनंद ने अमीरी और गरीबी के बीच की खाई, सांसद आदर्श ग्राम योजना की खामी का एक प्रेजेंटेशन के माध्यम से जीवंत चित्रण किया।

प्रउत फोरम की ओर से प्रउत के आर्थिक लोकतंत्र की अवधारणा पर बोलते हुए अधिवक्ता अमिताभ वर्माजी ने कहा कि, संविधान में भी सभी लोगों को रोजगार देने का प्रावधान है। किंतु इसे नीति निर्देशक तत्त्व में रखा गया है और यह मौलिक अधिकार में शामिल नही है। सर्वोच्च न्यायलय के कई फैसलों का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि इस मामले में सरकार उदासीन है और न्यायालय कुछ कर नही पा रही हैं। लेकिन प्रउत व्यवस्था में सभी के लिए रोजगार की व्यवस्था है इसकी उन्होंने तथ्यात्मक रूप से चर्चा की।

एक अन्य पैनल समाज के विभिन्न क्षेत्र से आये प्रतिनिधियों का भी था, जिसमे श्री ओंकार मित्तल, दीपाली शर्मा, श्री अनुज अग्रवाल, श्री डी आर निगम, श्री निशिकांत महापात्रा, श्री कल्यानेश आनंद एवम श्री सत्यप्रकाश भारत आदि प्रमुख थे। सभी ने अपना अपना अनुभव साझा किया और आर्थिक लोकतंत्र पर अपने विचार को रखा।

कार्यक्रम को सफल बनाने में  निरंजन कुमार, राजेश सिंह, अंतरंग योगी, अमिताभ वर्मा, यशराज आनंद, उत्पल चौहान और भूरा जी का अहम योगदान था।

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