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Sunday, 21 October 2018

कानपुर देहात - धर्म परिवर्तन को लेकर इस सख्श ने पहले मोदी और योगी को दी चुनौती, फिर कर दिया ये ऐलान

रिपोर्टर- अरविन्द शर्मा 
 
 
 
कानपुर देहात- विजय दशमी पर पूरे देश में जब रावण का पुतला दहन किया है। वहीं कानपुर देहात जिले के पुखरायां कस्बा में दलित हिन्दू समाज के लोगों ने एकत्र होकर रावण की पूजा की। इसके बाद पूरे कस्बे में जुलूस निकाला और करीब दस हजार लोगों ने धर्म परिवर्तन भी किया। वहीं 1000 लोगों ने सिर मुंडवाकर धर्म परिवर्तन कर बौद्ध धर्म अपनाया। 
 
 
 
वही राष्ट्रीय दलित पैंथर के प्रदेश अध्यक्ष धनीराम पैंथर ने बताया कि सम्राट अशोक ने विजयदशमी के दिन ही बौद्ध धर्म अपनाया था और डॉ भीमराव अम्बेडकर ने भी विजयादशमी के दिन 14 अक्टूबर 1956 में 5 लाख नारियों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी। हम बौद्ध धर्म अनुयायी है, इसलिए विजय दशमी के दिन हम धम्म दीक्षा एवं बौद्ध सम्मेलन का आयोजन यहां करते हैं।
 

 
बोले रावण राक्षस नही तथागत है
 
उन्होंने कहा कि रावण को आज के मनिवादी लोग राक्षस कहते हैं जबकि रावण बलि देने वाले, हत्या करने वाले लोगों का विरोध करते थे, उनके चरित्र की लोग सराहना करते है फिर पुतला फूंकने का रिवाज कैसा है। रावण राक्षस नहीं तथागत है, हम उनकी पूजा करते हैं। हम बौद्ध अनुयायी है और पूरे देश बौद्धमय भारत बनाना चाहते हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी पर निशाना साधते हुए कहा कि जब पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का मकान खाली होता है तो उसे गोमूत्र से शुद्ध किया जाता है, जिससे साफ जाहिर है कि अभी भी पूरी तरह से छुआछूत और भेदभाव का बोलबाला है।

10 लाख लोग ले रहे नागपुर में दीक्षा

उन्होंने कहा जब तक हिंदू धर्म रहेगा, तब तक दलित असहाय और कमजोर वर्ग के लोगों पर जाति के नाम पर उत्पीड़न होता रहेगा। हम भारत के संविधान को मानते है और संविधान हमें धर्म परिवर्तन का पूरा अधिकार देता है। आज का समाज इस छुआछूत से त्रस्त हो चुका है, इसलिए मजबूरन धर्म परिवर्तन कर रहा है। जिससे आहत होकर हिंदू धर्म का त्याग कर 10000 लोग कानपुर देहात के पुखरायां में बौद्ध धर्म अपनाएंगे और दीक्षा लेंगे। जबकि आज 10 लाख लोग नागपुर में दीक्षा ले रहे हैं। वही मंच पर खडे होकर राष्ट्रीय दलित पैंथर ने योगी और मोदी को चुनौती देते हुए धर्म परिवर्तन का एलान  किया। उन्होंने कहा कि योगी और मोदी से मैं कहना चाहता हूँ, अगर शूद्र समाज के लोगों को सम्मान देेंना चाहते हैं तो एक शंकराचार्य ब्राह्मण, दूसरा क्षत्रिय, तीसरा वैश्य और चौथा शंकराचार्य शूद्र होना चाहिए।

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