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Thursday, 7 February 2019

बस्ती -सल्टौआ ब्लाक में मौनी अमावस्या को लगने वाला बगढरवा मेले की कब और कैसे हुई शुरुआत जाने



बस्ती- बी कुमार 
सल्टौआ ब्लाक में मौनी अमावस्या को लगने वाला बगढरवा मेले की शुरुआत 1933 में बिशुनपुर निवासी शिवराज चौधरी द्वारा की गई।एक तालाब बाग और एक शिव मंदिर का निर्माण कराया गया।86 साल पहले जिस मेले की शुरुआत की गई थी उस समय न तो सड़के थी और न ही उस पर दौड़ने वाले साधन देश में गुलामी थी गरीबी चरम पर भुखमरी अपने सबाब पर संक्रामक बिमारी महामारी का रूप धारण किए हुए थी।उस समय की आवादी जनपद की हजारों में रही होगी।इतने सुरक्षा ब्यवस्था तो नहीं रही पंरतु ,जो हनक चौकीदार का था शायद कप्तान का हो,इतने तरह की मिठाईया पैसे की उपलब्धता उसकी उपयोगिता की केवल कल्पना हो सकती है। ऐसे में एक भब्य मेले की सोच शायद किसी कोरा सपना सरीखा था ।

 
धीरे धीरे समय आगे बढ़ा देश भी गुलामी से मुक्त हुआ शिक्षा, कृषि, चिकित्सा व अन्य क्षेत्रों में क्रांति देखने को मिला। बीसवीं सदी की शुरुआत मेले में जादू दिखाने वाले हाथी , भालू से लैस सर्कस मेले में पहुंचकर चीता,शेर की कलाबाजियां क्षेत्र के लोगो का आकर्षण का केंद्र बन गया।जो लोग बड़े बड़े शहरों में स्थित चिड़िया घरों में पहुंचकर शेर चीता तेंदुआ व अन्य खूंखार जंगली जानवर नहीं देख पाते वह इस मेले में कम शुल्क अदाकर उनके कला और कौशल को देख लेते थे।



लेकिन जब सर्कस में जंगली जानवर प्रतिबंधित हुए तो लगा मेले का मूल आकर्षण खत्म हो जाएगा , लकड़ी से बनेसामान खटिया, चारपाई, पलंग,पल्ला ,फाटक ,हाथा,चौकी से लेकर तख्त,सोफा ,बेड,सिगांरदान,दीवान,सेंटर टेबल , दरवाजा, फाटक आदि तक पहुंच गया।


मोटर से चलने वाले बड़े बड़े झूले ,ब्रेक डांस, पूर्वी उत्तर प्रदेश की कला व संस्कृति की झलक दिखाने के लिए थिएटर, युवाओं की पंसद बन गया है।वहीं मौत का कुआं में एक साथ तीन चार मोटरसाइकिले दो दो मारुति कार पर सवार युवकों के स्टंटबाजी का नजारा शायद अपने आप में मिशाल है।आधा दर्जन थाने के सुरक्षा कर्मी मेले के चप्पे चप्पे पर नजर रख कर सुरक्षा मुहैया कराने नायाब तरीका देखने को मिलता है।यूपी के बिभिन्न क्षेत्रो से ब्यावसायी अपनी दुकान सप्ताह पूर्व लाकर सजाते हैं।तो दूसरे प्रांतों से यहां तक कि मुंबई, कोलकाता,व बिहार से लकड़ी ब्यावसायी व अन्य ब्यापारी आते हैं।मित्र राष्ट्र नेपाल से भी मेले में अपना सामान बेचने के लिए आते हैं।तो शायद दूरसंचार की क्रांति युग व भागम भाग जिंदगी में चार पांच दिनों तक मेले की भीड़ बना रहना अपने आप में मिशाल है।

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