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Monday, 11 March 2019

वाराणसी - पांच साल के इंतजार के बाद डॉ दयाशंकर मिश्र दयालू को मिला राज्यमंत्री का दर्जा...

 कैलाश सिंह विकास ब्यूरो

राजनीति में कभी-कभी धैर्य भी बहुत कुछ दिला जाती है। धीरज से संतोष करने वालों को उसका फल जरूर मिलता है। अब बात करते हैं, बनारस के जुझारू नेता की जिन्होंने 2014 में नरेंद्र मोदी के लिए कांग्रेस का 'हाथ' झटक दिया था। उन्हें उम्मीद थी कि 2017 के चुनाव में प्रत्याशी बनया जाएगा। लेकिन ऐैसा नहीं हो सका। वह काफी मायूस भी हुए, कारण उनके साथ कांग्रेस का दामन छोड़ने वालों को कुछ न कुछ पारितोषिक मिल चुका था। मायूसी के बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी उसका नतीजा मिला कि उन्हें अब 2019 लोकसभा चुनाव के लिए अधिसूचना जारी होने से पहले राज्य मंत्री का दर्ज मिल गया।बात कर रहे हैं डीएवी इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ दयाशंकर मिश्र 'दयालू' का। उन्हें पूर्वांचल विकास बोर्ड का उपाध्यक्ष मनोनीत किया गया है। यह उनकी निष्ठा, ईमानदारी और धीरज का ही परिणाम है। बता दें कि दयालू को कांग्रेस ने भी हमेश तवज्जो दी। उन्हें यूथ कांग्रेस में पदाधिकारी बनाया गया, यूथ कांग्रेस के वह जिला अध्यक्ष रहे। उसके अलावा उन्हें शहर दक्षिणी विधानसभा से तत्कालीन भाजपा प्रत्याशी श्यामदेव राय चौधरी 'दादा' के खिलाफ मौका मिला। दो बार वह दादा के खिलाफ मैदान में उतरे। दोनों ही बार उन्होंने बीजेपी को कड़ी टक्कर दी और दूसरे नंबर पर रहे। शहर दक्षिणी विधानसभा क्षेत्र के वह लोकप्रिय नेता हैं।


बता दें कि दयालू के साथ डॉ अवधेश सिंह, पत्रकार से राजनीति में आए धर्मेंद्र सिंह, डॉ अशोक सिंह जैसे धुरंधर लोगों ने भी कांग्रेस का दामन 2014 में छोड़ा था। लेकिन डॉ अवधेश सिंह ही ऐसे रहे जिन्हें 2017 के विधानसभा चुनाव मे पिंडरा से टिकट मिला, बाकी सब को अभी तक इंतजार है।यहां यह भी बता दें कि दयालू को यूं ही 2019 लोकसभा चुनाव से ठीक पहले राज्यमंत्री का दर्जा नहीं दिया गया है। दयालू का उस विधानसभा क्षेत्र में दबदबा है जहां से प्रदेश के एक राज्यमंत्री विधायक हैं लेकिन उन विधायक का वो दबदबा नहीं जो दयालू का है। उनकी छवि भी इन दो सालों में काफी गिरी है। ऐसे में पार्टी को यह डर सताने लगा था कि अगर समय रहते दयालू को कोई महत्वपूर्ण पद नहीं दिया जाता तो लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी के लिए संकट पैदा हो सकता है। दयालू की नाविकों के बीच अच्छी घुसपैठ है। युवाओं के बीच भी उन्होंने गहरी पैठ बना रखी है। व्यवसायी वर्ग और खास तौर केवल शहर दक्षिणी विधानसभा ही नहीं बल्कि बनारस संसदीय सीट के ब्राह्मण वोट बैंक पर भी उनकी अच्छी खासी पकड़ है जो उनके अलावा और किसी ब्राह्मण नेता के पास नहीं।

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