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Sunday, 17 March 2019

वाराणसी - बाबा विश्वनाथ माँ पार्वती का गौना कराकर वापस लौटे, रंगो से सजी निकली बाबा की चल प्रतिमा..

 कैलाश सिंह विकास ब्यूरो 

देवादिदेव महादेव बाबा विश्वनाथ स्वयं ही काशी में विराजते है। काशी में वैसे तो हर दिन बाबा भोले से जुड़ा रहता है लेकिन शिवरात्रि के बाद पड़ने वाली रंग भरी एकादशी का अपना अलग ही महत्व है। इस दिन काशी मानों भोले भंडारी के रंग में रंग जाती है। भोले बाबा इस दिन माँ पार्वती के साथ खुद ही नकलते है। आज के पावन दिन बाबा के चल प्रतिमा का दर्शन भी श्रद्धालुओ को होता है और बाबा के दर्शन को मानों आस्था का जन सैलाब काशी के इन गलियों में उमड़ पड़ता है। मान्यताये है कि देव लोक के सारे देवी देवता इस दिन स्वर्गलोक से बाबा के ऊपर गुलाल फेकते है। इस दिन काशी विश्वनाथ मंदिर के आस पास की जगह अबीर और गुलाल के रंगों से सराबोर हो जाती है। भक्त जमकर बाबा के साथ होली खेलते है और मान्यता ये भी है कि बाबा इस दिन माँ पार्वती का गौना कराकर वापस लौटते है। बाबा के पावन मूर्ति को बाबा विश्वनाथ के आसान पर बैठाया जाता है।



धर्म की नगरी काशी रंग भरी एकादशी के दिन रंगों और गुलों से मानों नहा उठती है और ये रंग और भी चटकीला तब हो जाता है जब ये रंग बाबा और माँ पार्वती के ऊपर पड़ता है। मान्यता यह भी है की बाबा के साथ आज के दिन होली खेल मांगी गयी हर मुरादे पूरी होती है। आज के दिन काशी से ही नहीं बल्कि देश के अन्य जगहों से भी श्रद्धालु आते है जो बाबा विश्वनाथ और माँ पार्वती की चल प्रतिमा को रंग गुलाल लगाकर अपनी सभी मनोकामना पूरी होने कामना करते है। शिवरात्रि के बाद पड़ने वाली एकादशी को बाबा का गौना होता है।ये परम्परा दो सौ साल पुरानी है जो इसी तरह होती चली आ रही है। हर काशीवाशी बाबा को गुलाल लगाना चाहता है और बाबा सबके साथ अबीर और गुलाल की होली खेलते है।काशी नगरी में एक दिन ऐसा भी रहता है जब बाबा खुद अपने भक्तों के साथ होली खेलते है। रंगभरी एकादशी के दिन बाबा की चल प्रतिमा अपने परिवार के साथ निकलती है।

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