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Friday, 12 July 2019

बाराबंकी - दर ब दर ठोकरे खाई तो मालूम हुआ की घर किसे कहते क्या चीज है बेघर होना।




ब्यूरो चीफ योगेश तिवारी

 किसी शायर की लाइने घाघरा नदी के कटान पीङितों  पर सटीक बैठ रही है। क्षेत्र के कचंनापुर के कई दर्जन लोग आज भी घाघरा नदी की कटान से दर ब दर की ठोकरे खा रहे है।गांव में साथ- साथ रहने की कसमें खाने वाले ग्रामीणों को नदी की क्रूर धारा ने खाना बदोश जीवन जीने पर मजबूर कर दिया है। एक साल पहले हर साल चलने वाली घाघरा नदी की विनाश लीला में पूरा कचंनापुर गांव नदी की आगोश में समा गया था। ग्रामीण अब अस्त व्यस्त तरीके से अपना जीवन सङक के किनारे किसी तरह से काट रहे है।कचंनापुर के रहने वाले सलीम बताते है कि करीब एक साल पहले उनका तीन चार कमरे वाला उनका घर उनकी आंखों के सामने कट गया। किसी तरह कुछ बचे घर के सामान से कचंनापुर सङक के की पटरियों पर झोपङी बनाकर घर बनाया है जमीने कट गई। अली हसन कहते है घर कटने के बाद झोपङी में रहते है परिवार व गांव के सभी लोग बिछङ गये। रज्जन कहते है कटान से घर बार तो चला गया बच्चों की पढाई पर बुरा असर पङा है। अली अहमद कहते है कि घर कटने से सङक के किनारे अपनी मङैय्या डाल रखी है। उनका कहना है कि बरसात आ रही है।फिर उजङना पर सकता है। नदी की घरघराहट में रात को नींद नही आती है। इस तरह सङकों के किनारे कटान पीङितों का जीवन बङी मुश्किल में कट रहा है। जबकि बरसात शुरू हो चुकी है। जो कटान पीङितों के लिए फिर मुसीबत बन सकती है।

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