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Monday, 18 November 2019

भारत में मोबाइल सेवाओं के बाजार की हालत लगातार खराब होती जा रही....

 
 
 
 
भारत में मोबाइल सेवाओं के बाजार की हालत लगातार खराब होती जा रही है ऐसे में एक कदम पीछे हटकर कुछ बुनियादी चीजों पर गौर करना फायदेमंद हो सकता है। मैं यह बात पूरी गंभीरता से कह रहा हूं। भारत में टेलीकॉम सर्विस पर ऊंची टैक्स दरों की वजह से ये सेवाएं कंपनियों के लिए आर्थिक तौर पर वहनीय नहीं रह गई हैं। कुछ सप्ताह पहले मैंने अपने कॉलम में लिखा था कि भारत में टेलीकॉम सेवाओं की बुरी हालत इसलिए है क्योंकि लाइसेंस फीस और स्पेक्ट्रम चार्जेज असल में सेवाओं का उपयोग करने वालों यानी आम ग्राहकों पर टैक्स की तरह हैं। टेलीकॉम कंपनियां लाइसेंस फीस और स्पेक्ट्रम चार्जेज के तौर पर जो रकम सरकार को चुकाती हैं वह रकम उनको यूजर्स से ही वसूल करना होता है। एक तरह से यह रकम टेलीकॉम कंपनियां एडवांस के तौर पर जमा कराती हैं। जब तक हम यह नहीं स्वीकार करेंगे कि यही टेलीकॉम सेक्टर की बदहाली की अहम और असल वजह है, तब तक समाधान का कोई रास्ता नजर नहीं आएगा। वास्तव में अगर भारत में अप्रत्यक्ष कर की मौजूदा प्रणाली का सही तरीके से पालन किया जाए, तो लाइसेंस फीस को जीएसटी के दायरे में शामिल कर लिया जाना चाहिए। एक तरह से देखें तो टेलीकॉम यूजर्स पर सेल्स टैक्स 50 फीसद से लेकर 100 फीसदी से भी अधिक है।मौजूदा समय में मोबाइल यूजर्स से जो कीमतें ली जा रही हैं और जितना टैक्स वसूला जा रहा है उसको अगर मिला दिया जाए तो ज्यादातर भारतीय ग्राहक मोबाइल सेवा लेने में खुद को असमर्थ पाएंगे। इस समीकरण के कुछ हिस्से को बदलना होगा। अगर टेलीकॉम सेवाओं की कीमत बढ़ाकर उस स्तर पर लाई जाए जहां से मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियां वित्तीय रूप से सक्षम हो सकें, तो मोबाइल फोन का बाजार बुरी तरह से सिकुड़ जाएगा। हो सकता है कि यह घटकर एक-चौथाई रह जाए। अगर टेलीकॉम सेक्टर को इससे बचाना है, तो फिर कुछ ऐसा होना चाहिए कि मोबाइल सेवाओं का इस्तेमाल करने वाला हर व्यक्ति इसकी पूरी लागत को वहन कर ले। ऐसे में टैक्स में बड़े पैमाने पर कटौती की जानी चाहिए।

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