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Thursday, 20 August 2020

सरकार एवं बेचारा किसान

कृपा शंकर चौधरी

      सरकार एवं बेचारा किसान

देश अंग्रेजों की जंजीर तोड़ आजाद हो गया किन्तु किसानों का एवं सोने की चिड़िया कहें जाने वाले भारत में किसान की हालत बद से बद्तर  होती रही। स्वतंत्रता के बाद कुछ सरकारों ने स्थितियां सुधारने का प्रयास किया जो कुछ हद तक सफल भी रहा किन्तु फिर वही ढाक के तीन पात वाली स्थिति बनी रही। अन्नदाता किसान धूप में जलता रहा ठंडक उसे लगती रही बारिश से बदन भीगता रहा किन्तु उसे केवल एक चिंता रही की पैदावार नहीं होगा तो देश क्या खाएगा। आखिर हम और सरकार इतने दिल के कठोर क्यो बने रहे कि किसानों की हालत बद से बद्तर बनती गई।

सरकारी आंकड़ों के खेल देखने पर लगेगा कि सरकारें किसानों के लिए सोच रही है किन्तु जमीनी हकीकत है कि सारे नीति केवल कागजों तक सिमट कर रह गई है। विडंबना देखिए कि मिट्टी में रहने वाले किसानों के लिए वातानुकूलित कमरे में रहने वाले नीति बनाते हैं आखिर वह कैसे सफल हो सकता है। धन भी जो सरकार द्वारा निर्गत होता है बंदर बांट का शिकार है। निरंतर कर्ज के बोझ तले दबते किसानों की स्थिति दयनीय बनी हुई है और लोग किसानी को छोड़ रहे हैं या आत्महत्या का रास्ता चुनना बेहतर समझते हैं।

आंकड़े बताते हैं कि हजारों किसानों ने आत्महत्याएं कर लिया किन्तु सरकारों के कान और आंख बंद रहे । विपक्ष ने आवाज उठाई किन्तु वह केवल वोट की राजनीति रही। मलहम के तौर पर लोकलुभावन घोषणा और आंशिक कर्जमाफी की गई जिसे पा कर किसान  उसी तरह संतुष्ट हो गया जैसे बरसात की जरूरत पर फसल बादलों को देख संतुष्ट हो जाते हैं। आखिरकार बरसात न होने पर फसल बरबाद हो जाती है। फिर भी नहीं हारने वाले कमर टूटे किसानों द्वारा पुनः नयी उर्जा और उम्मीदों के साथ नयी फ़सल की तैयारी कर दी जाती है।

आखिर किसान क्यो नही उभर पा रहा है को ध्यान दें तो दो बातें निकल कर आती है। या तो सरकार के पास योजना बनाने में कमी है या सरकार नहीं चाहती कि किसानों का विकास हो। आखिर 65-70% किसानों के देश में किसानों का शोषण क्यो ?
आखिर क्यों मुट्ठी भर (पूंजीपति ) लोगों को हित पहुंचाने के चक्कर में सरकार इतने लोगों को दरकिनार करती है ? प्रत्येक वर्ष बजट पारित किया जाता कृषि क्षेत्र के विकास के लिए क्यो कम धन राशि रखी जाती है? कृषि को उद्योग का दर्जा क्यो नही दिया जाता आदि आदि प्रश्र उठने स्वभाविक है जिसका उत्तर देना सरकार नहीं चाहेंगी क्योंकि उसे सरकार जो चलानी है। इतिहास गवाह है कि जब किसी राज्य में बुद्धिजीवियों (सरस्वती) के भरोसे राज चला तो खुशहाली रही किन्तु जब राजा पर सामंतों (लक्ष्मी) का प्रभाव बढ़ा तो लूट, भ्रष्टाचार , गरीबी का दौर बढ़ता गया है। आज की स्थिति है कि सरस्वती ने लक्ष्मी के सामने घुटने टेक दिए हैं तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्थितियां अभी और क्या बनेंगी।

गौरतलब है कि 1950-51 में देश के सकल घरेलू उत्पाद में प्राथमिक क्षेत्र (कृषि) द्वितीय क्षेत्र (उद्योग) एवं तृतीय क्षेत्र (बाजार) का योगदान (1993-94 की कीमतों पर) क्रमशः 59%,13.3%, तथा 27.5% था जो 2011-12 में 13.9%,27%,49% हो गया जो अब और विषम   हो चुका है। ग्रामीण एवं कृषि की उपेक्षा के कारण राष्ट्रीय उत्पाद में कृषि क्षेत्र की भागीदारी कम होती गई है किन्तु उद्योग एवं बाजार क्षेत्र में भागीदारी बढ़ती गई परिणामस्वरूप किसान और मजदूर निरंतर गरीब होते गए तथा शहर के उद्यमी तथा व्यवसायी अमीर होते गए। एक अनुमान के मुताबिक राष्ट्रीय आय का लगभग 33% भाग उच्च वर्ग के परिवारों को प्राप्त हो रहा है जबकि 33% परिवारों को 34% भाग ही प्राप्त होता है तथा 66% परिवारों को मात्र 33% में गुजर बसर करने को बाध्य होना पड़ता है।
किसानों को केंद्र में रखकर विकसित देश चीन से तुलना करें तो लगभग दोनों देशों ने एक साथ आजादी प्राप्त किया किन्तु चीन ने कृषि पर अधिक ध्यान देकर अपनी एक अलग पहचान बनाई। इसी तरह कई अन्य देशों ने भी कृषि को बढ़ावा दिया और उन्हें सार्थक परिणाम भी मिले। भारत में किसानों  एवं देश को यदि आगे बढ़ाना है तो दूरदृष्टी अपनाते हुए सार्थक नीति बनाने की आवश्यकता है इसके अलावा कृषि को उद्योग का दर्जा दिया जाना अत्यंत आवश्यक है।

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