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Monday, 12 February 2018

बस्ती -पंद्रह वर्षों से लापता कारगिल का शेर, तंगी की हालात में राहें निहार रही ऑंखें

                विश्वपति वर्मा ;
रिपोर्ट -धर्म प्रकाश एवं बब्लू यादव 

भारतीय सेना में तोपची के पद तैनात जवान राजेंद्र प्रसाद चौहान  का कारगिल युद्ध के दौरान 1999  में महत्वपूर्ण भूमिका रहा है ,युद्ध में तोपची टाइगर हिल पर राजेंद्र ने दुश्मनों से लोहा लेते हुए देश के लिए कर्त्यव्यों का पालन करते हुए शानदार भूमिका का निर्वहन किया था। लेकिन 2003 से  जवान राजेंद्र का कोई पता ठिकाना नहीं है ,वंही जवान राजेंद्र के परिवार को अदद  सरकरी सुबिधायें भी नहीं मिल पाई है राजेंद्र की बड़ी बेटी बंदना इंजीनियर बनने का सपना छोड़ चुकी है क्योंकि परिवार का माली हालत ठीक नहीं है। लेकिन अभी भी परिवार के लोग जवान के आने की राहे निहार रही हैं। 


बस्ती जनपद के सल्टौआ ब्लॉक अंतर्गत आने वाली ग्रामपंचायत दसिया के निवासी राजेंद्र प्रसाद चौहान 05 सितम्बर 1992 में सेना में भर्ती हुए थे। सेना में सेवा देते हुए राजेंद्र ने वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध में महत्वपूर्ण  योगदान दिया था ,युद्ध में सफलता के बाद वर्ष 2002 में राजेंद्र अंतिम बार घर आये हुए थे उसके बाद से  वे लापता हैं। युद्ध के बाद से भले ही देश के भीतर जश्न मनाये गए लेकिन राजेंद्र के परिवार वालों  को  जख्म ही मिला। 

मानसिक रूप से विक्षिप्त हुई मां पत्नी की हालत ठीक नहीं 

जवान राजेंद्र की 80 वर्षीय मां यशोदा अपने बेटे की याद  में रोते -रोते मानसिक रूप  विक्षिप्त हो चुकी है ,दरवाजे पर कोई पंहुच जाये तो बेटा -बेटा  कहकर चिल्लाने लगती हैं कुछ देर बाद कहती हैं साहब.... मेरा बेटा कहा  है ,मां यशोदा का स्वास्थ्य भी सही नहीं रहता लेकिन आर्थिक समस्या की वजह से ठीक ढंग से इलाज भी नहीं हो पा  रहा है। इसी प्रकार पत्नी नीरमती की हालत भी पति की याद  में खराब हो गई उनकी पत्नी से कुछ पूछने के बाद काफी देर में जवाब देती हैं। 

सरकारी सुबिधाओं को मोहताज परिवार 

जवान के लापता होने एवं परिवार की स्थिति खराब होने के बाद भी आज तक परिवार को किसी तरहं की सरकारी सुबिधायें नहीं मिल पाई है। एक तरफ जंहा पत्नी को पेंशन तक नहीं मिलता वंही गरीबी ,बेबशी एवं लाचारी में जीवन यापन करने वाले परिवार के पास सरकारी दुकान से  राशन लेने के लिए  राशन कार्ड भी नहीं है। 

बेटे -बेटियों की बंद होगी पढाई 

राजेंद्र के तीन बेटी एवं एक बेटे की पढाई लिखाई भी बंद होने के कगार पर पंहुच गया है ,अभी तक स्कूल  के खर्चे का बंदोबस्त बच्चों के बाबा रामधन चौहान जो खुद सेना में जवान थे वे अपने पेंशन के हिस्से में से करते थे ,लेकिन फ़रवरी 2017 में  उनके निधन की वजह से परिवार के मुखिया के पास  अब किसी प्रकार का कोई श्रोत नहीं रह गया है। 

सेना मुख्यालय  पंहुचे  थे पिता 

राजेंद्र के पिता रामधन चौहान भी सेना में  जवान थे ,अपने सेवा काल  के दौरान गोली लगने की वजह से रामधन चौहान के दोनों पैर कटवाने पड़े थे ,लेकिन उनके हौसले कभी पस्त  नहीं हुए । अपने बेटे के  लापता होने की सूचना पर रामधन सेना मुख्यालय भी पंहुचे लेकिन उन्हें वंहा से खाली  हाथ लौटना पड़ा ,सेना के रिकार्ड में दिखाया गया कि राजेंद्र प्रसाद 13 दिसम्बर 2003 को लोकल डिस्चार्ज लेकर घर चले गए थे ,आख़िरकार दोनों पैरों चलने में असमर्थ पिता को वंहा पंहुचने के बाद थक -हार  कर वापस लौटना पड़ा।  

कारगिल युद्ध में दुश्मनों के छक्के छुड़ाने वाले राजेंद्र के परिवार के पास अभी तक कोई विभागीय सहायता नहीं पंहुच पाई है। दुर्भाग्य की बात है कि 15 वर्ष बीत जाने के बाद आज तक न तो सेना के अधिकारी पीड़ित परिवार से मिलने आये और न ही किसी प्रशासनिक अधिकारी  द्वारा बेबश परिवार की मदद की गई ,इतना ही नहीं झूठ के बुनियाद पर खड़े जनप्रतिनिधियों द्वारा भी लाचार परिवार का कोई मदद नहीं किया गया।  

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