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Friday, 23 February 2018

गरीब का बेटा बताने वाले मोदी जी क्या खाएंगे मिड डे मील का खाना

विश्वपति वर्मा ;

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषण के दौरान कई बार कह चुके हैं कि  मै  गरीब का बेटा  हूँ। और उन्होंने ऐसे ही शब्दों की  बाजीगीरी कर देश  भर में काफी लोकप्रियता भी बटोरी इसका परिणाम रहा कि  गरीब ,मजदूर ,किसान  का रुझान लोकसभा चुनाव में मोदी के पक्ष में था। लेकिन शायद आज देश के किसी भी ऐसे मतदाता के बच्चों को उचित सुबिधायें नहीं मिल पाई हैं जो गरीब हैं। अगर प्रधानमंत्री मोदी गरीबों के हमदर्द हैं तो उन्हें गरीबों और गरीबी की समस्या समझनी चाहिए इसके लिए उन्हें कम  से कम  विद्यालयों  में बनने वाली मिड डे मील योजना को को तो अपग्रेड करना ही चाहिए।

स्कूलों में  छात्रों के नामांकन बढ़ाने और अधिक छात्रों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा इस योजना की शुरुआत प्रायोजित स्कीम के रूप में 15 अगस्त, 1995 को आरंभ की गई थी बाद में पूरे देश में इस योजना को व्यापक पैमाने पर शुरू की गई लेकिन आज तक योजना उद्देश्य के एक फीसदी अंक को भी पूरा नाही कर पाया।   योजना के तहत देश भर के  12 लाख स्कूलों में लगभग  12 करोड़ बच्चों को दोपहर का खाना दिया जाता है. इस योजना पर सरकार सालाना करीब साढ़े नौ हजार करोड़ रुपये  खर्च करती है. जिसमे कक्षा 1 से लेकर 5 तक एवं 6 से लेकर आठवीं तक के बच्चों को इस योजना के तहत खाना मिलता है जिसके लिए सरकार  द्वारा प्रति बच्चे के हिसाब से प्राथमिक स्तर पर 04.13 रुपया वंही उच्च प्राथमिक विद्यालय को 06.18 रुपया दिया जाता है। 



स्कूलों में मीनू के हिसाब से  बच्चों के सामने जो खाना परोसा जाता है वह पौष्टिक भोजन एवं गुणवक्ता को पूरा कर पाने में अपर्याप्त है। आज जब बाजार में पांच रूपये में चाय भी नहीं मिलने वाला है तब बच्चों को पांच रूपये में पौष्टिक भोजन  कैसे मिल सकता है यह एक गंभीर प्रश्न है। स्कूल में उपलब्ध चावल और आटें को अगर छोड़ दिया जाये तो सुद्ध भोजन को तैयार करने के लिए ,तेल ,मसाला ,आलू ,प्याज ,लहसुन की जरुरत भी नार्मल तौर पर होती है जिसमे और भी कई सामग्री की जरुरत है परन्तु इतना सब कुछ करने के लिए महज 4 रुपया उपलब्ध करवाना और उसमे भी सेंध मारना यह सदन में 9 रुपया प्लेट में नॉनवेज खाने वाले सांसदों द्वारा मतदाता के मुँह पर किसी तमाचे को  मारने  से कम  नहीं है। खुद नरेंद्र मोदी भी वाराणसी से सांसद  हैं और प्रधानमंत्री भी इसमें दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि  नरेंद्र मोदी अपने आप को गरीब का बेटा  कहते हुए फिरते हैं लेकिन प्रधानमंत्री ने कभी स्कूलों में बनने वाले मध्याह्‌न भोजन को नहीं चखा होगा ,अगर प्रधानमंत्री से प्रश्न किया जाये कि  क्या वे मध्यान भोजन को खाएंगे तो सवाल  का जवाब क्या होगा यह कोई वोटर नहीं जनता।

अगर पूर्वी राज्यों की बात की जाये तो यंहा पर योजना की हालत सबसे ज्यादा दयनीय है ,बच्चों को मिलने वाले भोजन में  जब दाल की पारी आती है तब दाल में नमक और हल्दी की सही मात्रा भी नहीं मिल पाती ,बच्चों के थाली में जो सब्जी परोसा जाता है उसमे तेल और मसाले के नाम पर नमक और हल्दी ही दिखाई पड़ती है ,खिचड़ी जो देश का राष्ट्रिय भोजन बनने के होड़ में है कम  लागत और कम मेहनत में  जिसे खाकर इंसान अपने आप को तरोताजा महसूस करता है उस खिचड़ी को गली का आवारा कुत्ता भी नहीं खाता  और यह भोजन देश के नौनिहालों को दिया जाता है जिसके दांव पर देश विश्वगुरु बनने की कल्पना कर रहा है।

अभी सरकार  को मिड डे मील योजना में काफी कुछ सुधार  करने की जरुरत है जिसमे चावल ,दाल ,सब्जी तहरी एवं रोटी की गुणवक्ता सुनिश्चित करने एवं बच्चों को खाना परोसे जाने के लिए बैठने की ठीक-ठाक व्यवस्था करने के साथ उनके लिए खाने की थाली एवं पानी पीने की वर्तन के अलावां स्कूल में बच्चों को मिलने
वाले भोजन की समय -समय  डाक्टरी जाँच कराने की जरुरत है। अगर सरकार इतना सब कुछ नहीं कर पाती तो उसे इस योजना को तत्काल प्रभाव से बंद कर देना चाहिए।

मध्याह्‌न भोजन स्कीम देश के 2408 ब्लॉकों में एक केन्द्रीय प्रायोजित स्कीम के रूप में 15 अगस्त, 1995 को आरंभ की गई थी। वर्ष 1997-98 तक यह कार्यक्रम देश के सभी ब्लाकों में आरंभ कर दिया गया। वर्ष 2003 में इसका विस्तार शिक्षा गारंटी केन्द्रों और वैकल्पिक व नवाचारी शिक्षा केन्द्रों में पढ़ने वाले बच्चों तक कर दिया गया। अक्तूबर, 2007 से इसका देश के शैक्षणिक रूप से पिछड़े 3479 ब्लाकों में 6 से 8 तक  पढ़ने वाले बच्चों तक विस्तार कर दिया गया है। वर्ष 2008-09 से यह कार्यक्रम देश के सभी क्षेत्रों में उच्च प्राथमिक स्तर पर पढने वाले सभी बच्चों के लिए कर दिया गया है। राष्‍ट्रीय बाल श्रम परियोजना विद्यालयों को भी प्रारंभिक स्‍तर पर मध्‍याह्न भोजन योजना के अंतर्गत 2010 से शामिल कर लिया गया। 




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