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Tuesday, 13 March 2018

योगी सरकार की पहली वर्षगांठ, 2022 के नतीजों के लिए बड़ी चुनौती


 विश्वपति वर्मा 
  '' लखनऊ ''
9415092208 ;


योगी सरकार के  कार्यकाल का  एक साल पूरा हो गया है। प्रदेश में पार्टी को मिली अप्रत्याशित जीत के साथ पार्टी द्वारा किये गए कई वादों पर खरा उतरने के लिए सरकार के लिए चुनौती बनी हुई है ।अभी प्रदेश में  भ्रष्टाचार ,बेरोजगारी ,गंदगी ,वायु प्रदूषण, यातयात ट्रैफिक, ग्रामीण विकास ,शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में कोई बदलाव नही आया है ,जबकि भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने इन सभी विसंगतियों का हवाला देते हुए प्रदेश की जनता से सरकार बनाने की अपील की थी।  इस समय भाजपा की सरकार के एक साल पूरे हो गए हैं अब सरकार को अगले 4 सालों के अंदर इन बिंदुओं पर बदलाव के लिए सार्थक प्रयास करने होंगे ।अन्यथा पिछली सरकारों की तरहं ही इस सरकार को भी प्रदेश के मतदाता कोसते हुए नए विकल्प की तलाश करेंगे !

आज आम आदमी को सरकारी कार्यालयों में अपने किसी छोटे से छोटे कार्य को कराने के लिए जिम्मेदार लोगों द्वारा प्रताड़ित होना पड़ता है । तहसील ब्लॉक और थाने पर शायद ही ऐसा कोई मामला हो जो बिना रिश्वत दिए आम आदमी के पक्ष में आ जाये। अभी सरकार को इस बात का विशेष ध्यान देना होगा कि बीजेपी जब प्रदेश में चुनाव लड़ने आई थी तो प्रदेश के  मतदाता से इन विसंगतियों से निजात दिलाने के लिए वादा करने में पीछे नहीं हटी थी। प्रदेश में रोजगार नाम की कोई चीज नही है उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी का आंकड़ा कितना खतरनाक इसे जानने के लिए प्रदेश के किसी भी भर्ती प्रक्रिया को ही देख लेना काफी होगा ,प्रदेश में बेरोजगारी का यह आलम है कि सफाईकर्मी के निकले 100 पदों के लिए करीब 20000 आवेदन आये थे। इतना ही नहीं आवेदनकर्ता में पीएचड़ी और एमबीए सहित कई डिग्री होल्डर शामिल थे। अब सरकार को इन पढ़े लिखे युवा बेरोजगारों के लिए रोजगार के साधन उपलब्ध कराने के लिए सबसे आगे आना चाहिए ।

 वैसे साफ सफाई अकेले करने वाली चीज नहीं है इसमें  हर व्यक्ति को हिस्सा लेना चाहिए। परन्तु सवाल भी पैदा होता है कि जब सरकार  साफ सफाई के लिए देश की जनता से 0.5 सेसे टैक्स ले रही है तब वह पैंसा कंहा खर्च किया जा रहा है.स्वछता का आलम यह है कि प्रदेश की राजधानी लखनऊ के वीआईपी इलाकों में गंदगियों की फैक्ट्री लगी हुई है। सचिवालय से महज एक किलोमीटर की दूरी पर गंदगियों का वह जखीरा है कि वंहा पर रहने वाले लोग मौत की मुँह में शमा सकते हैं। क्योंकि खुद मुख्यमंत्री योगी  का ही कहना है की गंदगियों की वजह से जानें जाती हैं। जैसा कि उन्होंने गोरखपुर मेडिकल कालेज कांड में कहा था । 

दिल्ली के बाद एक बार फिर प्रदेश की राजधानी  लख़नऊ भी वायु प्रदूषण की समस्या की वजह से शीर्ष पर रही है सेंटर फॉर एन्वॉयरोंमेंट एंड एनर्जी डेवलपमेंट (सीड) द्वारा वर्ष 2017 में शुद्ध हवा की गुणवत्ता से संबंधित रिपोर्ट तैयार की गयी । रिपोर्ट के अनुसार लखनऊ में सालों भर वायु प्रदूषण का स्तर खतरनाक स्तर पर लगातार कायम रहा है। साल भर में केवल 17 दिन ही हवा की गुणवत्ता 'अच्छी' केटेगरी की थी के रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश की राजधानी में दिल्ली के बराबर प्रदूषण मापा गया है ,आखिर प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए सरकार द्वारा ठोस कदम क्यों नहीं उठाये जा रहे हैं। वायु प्रदूषण को बढ़ाने में सबसे आगे  पुरानी  भंगार गाड़ियों का चलन अभी खुद रोडवेज के पास है तो वह दूसरे  गाड़ियों और किसानों से पराली  जलाने  को सरकार कैसे रोक सकती हैं।  राजधानी लखनऊ ,इलाहबाद और  नोयडा शहर में मैने घूम कर देखा तो यातायात ट्रैफिक की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है इसका समाधान क्या होगा इसके लिए तो सरकार  को कुछ सोचना चाहिए है। 

गाँधी जी के ग्राम स्वराज के सपने को आखिर कौन सरकार  पूरा करेगी ?यह तो लगातार प्रश्न का विषय बना हुआ है। अभी भारतीय जनता पार्टी द्वारा केंद्र के बाद प्रदेश के ग्रामीण विकास के बारे में मंच और माइक पर खूब राग अलापे गए परन्तु अभी तक तो ग्रामीण क्षेत्र में ऐसा कोई विकास नहीं दिखाई दे रहा है जिससे अंतिम पंक्ति में जीवन यापन कर रहे लोगों को अग्रिम पंक्ति में आने  का मौक़ा मिला हो। 



देश के सबसे बड़े राजनीतिक सूबे उत्तर  प्रदेश ने अब तक देश को 9 प्रधानमंत्री दिए हैं उसके बावजूद भी देश की शैक्षणिक व्यवस्था शून्य है हालिया जारी एक रिपोर्ट  मुताविक प्रदेश में 17602 सरकारी स्कूल ऐसे हैं जंहा पर केवल एक अध्यापक से विद्यालय  चल रहा है। 

प्रदेश की चिकत्सा व्यवस्था में कभी भी कोई ऐसा सुधार  देखने को नहीं मिला जिससे की आम आदमी को सरकारी अस्पतालों में बेहतर स्वास्थ्य सुबिधायें मिल पाए। एक रिपोर्ट के अनुसार चिकित्सा के क्षेत्र में उत्तर  प्रदेश का स्थान रैंकिंग में 14 वें स्थान पर है ,उत्तर प्रदेश मेडिकल सेक्टर  में अभी अन्य राज्यों से काफी पिछड़ा है। ऐसे ही ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को अभी भी मामूली सी स्वास्थ्य सेवा के लिए जिला मुख्यालय एवं प्राइवेट अस्पतालों की तरफ भागना पड़ता है। 

इतना ही नहीं अभी सरकार  को प्रदेश के समग्र एवं समेकित विकास के दिशा में कामयाबी पाने के लिए काफी कुछ करने की जरुरत है,वर्तमान समय में प्रदेश की बहुसंख्यक आबादी जागरूकता के अभाव में जी रही है ,प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्र में ऐसे बाहुल्य लोग हैं जिनके पास अभी तक रहने के लिए छत नहीं है ,प्रदेश में ऐसे बहुत सारे  भूमिहीन हैं जिन्हे अभी तक खाद्य सुरक्षा अधिनियम का लाभ नहीं मिल पा  रहा है। प्रदेश में जन सूचना अधिकार के तहत प्राप्त की जाने वाली जानकारी कानून भी कमजोर हो चुकी है इन सभी व्याप्त विसंगतियों पर जब तक समाधान नहीं आता तब तक प्रदेश में विकास नाम की चाहे जितनी भी बातें कर ली जाएँ वह सब अधूरी रहेगी ,अतः सरकार के पास अभी चार साल का पूरा समय बचा है इसमें वह आम जनमानष के हित में सही निर्णय ले अन्यथा 2007 में बसपा एवं 2012 में सपा को पूर्णबहुमत मिलने के बाद  अविश्वसनीय नतीजों का सामना करना करना पड़ा है  इसमें कोई दो राय नहीं है कि भाजपा को भी ऐसे ही 2022 के चुनाव में मुँह को खानी पड़ सकती है। 

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