नई दिल्ली -निगाहें टकटकी लगाए देख रही थीं कि डस्टबिन में खाना कौन फेंकेगा - तहकीकात न्यूज़ | Tahkikat News |National

आज की बड़ी ख़बर

Monday, 5 March 2018

नई दिल्ली -निगाहें टकटकी लगाए देख रही थीं कि डस्टबिन में खाना कौन फेंकेगा

विश्वपति वर्मा ;

 बारह और तेरह वर्ष की उम्र के दोनों थे एक के पैर में चप्पल नहीं था तो दूसरे ने फुल साइज  के पैंट को काट कर उसे कैपरी बना कर पहन रखा था। लग्जरी गाड़ियों के बगल में घूम -घूम कर अंदर की तरफ झांक रहे थे। फिर न जाने क्या ख्याल आया दोनों दौड़कर डस्टबिन के पास पंहुच गए। परन्तु वे वंहा से निराश होकर लौटते हुए एक दूसरे के कंधे पर हाथ रखकर बाबा खड्ग सिंह मार्ग के बगल में बने डिवाइडर पर बैठ गए। वे डस्टबिन की तरफ खाली  प्लेट लेकर जाने वाले सभी जनों के हाथ  ताक  रहे थे। कुछ देर बाद एक युवा  हाथ में कढ़ी -चावल का प्लेट लाकर उनकी तरफ बढ़ा दिया खाने का  प्लेट देखकर दोनों के हाथ बांहों से अलग होकर झपट कर आगे बढ़ गए और अपने हाथों में भोजन  के प्लेट को लेकर जल्दी -जल्दी खाने लगे यह पूरा आँखों देखा वाकया  नई दिल्ली के कनॉट प्लेस से गुजरने वाले बाबा खड्ग सिंह मार्ग पर स्थिति जैन चावल वाला की दुकान के सामने का है।

                                                     प्रतीकात्मक चित्र 


मुझे लगा कि वे डस्टबिन से  बिकने वाले रद्दी  को एकत्रित करने की जुगाड़ में बैठे हैं लेकिन उन्होंने अपना भी प्लास्टिक वाला प्लेट उसी डस्टबिन में ले जाकर तेजी से फेंक दिया  और पुनः उसी स्थान पर आकर बैठ गए लेकिन उनकी निगाहें अब किसी प्लेट और डस्टबिन के तरफ नहीं था अब वे जमीन की तरफ देख रहे थे तब मुझे लगा कि ये बालक रद्दी नहीं बल्कि  कुछ और की तलाश में थे। गाड़ी के अंदर बैठ कर सारा नजारा देखने के बाद अब हमने  भी कार के दरवाजे को खोल दिया था और  महज 5 कदम दूरी पर बैठे उनके पास मै  पंहुच गया। 

जब उनके रहने का स्थान मैने पूछा तो वे पास में ही रहने की बात इशारे में बता दिए। जब मैने उनसे पूछा कि डस्टबिन में क्या देख रहे थे तब लड़कों ने बताया भूख लगी थी बाऊ जी ... यही सोच रहे थे कि कोई अपना आधा खाना उसमे फेंक दे तो हमारी भी भूख मिट जाती। मैने पूछा खाना खाओगे तो उन्होंने कहा नहीं बाऊ जी अभी एक लोग पूरा भर कर खाने का प्लेट देकर गए हैं अब पेट भर गया है  हम लोग जा रहे हैं।

 यह सुनने के बाद मन द्रवित हो गया मेरी ऑंखें उन्हें तब तक देखती रहीं जब तक वे नजरों से ओझल नहीं हो  गए। फिर पास में ही खड़ी गाड़ी में आकर हम भी बैठ गए।मन में कई प्रकार की विचारें आ रही थीं कभी सोचते काश कोई जादू की छड़ी होती तो कुछ देर तक  नफरत भरे शब्दों में  देश की व्यवस्था चलाने  वाले लोगों के प्रति न जाने जीभ और ओठों ने क्या -क्या बुदबुदा डाला। और शर्म आ रही थी मुझे देश पर कि मै एक वह भारतीय हूँ जो अन्नपूर्णा का देश है और वंहा भूख से बिलबिलाते  बच्चे  पेट की आग बुझाने के लिए दूसरे के इच्छा भरने के बाद फेंके गए जूठे बर्तनों  में भोजन ढूढ़ रहे हैं। 


ऐसी गंभीर स्थिति को देखकर एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि  देश की सरकारों  द्वारा मध्यान्ह भोजन योजना को छोड़कर  सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अलावां गरीब परिवार को भोजन उपलब्ध कराने के लिए क्या कोई योजना नहीं चलाई जा रही है ?  क्या गरीब बस्ती के झुग्गी झोपड़ियों में गुजारा  करने वाले लोगों के पास खाद्य सामग्री की उपलब्धता न्यून्तम दामों पर नहीं हो रहा है ?क्या ऐसे परिवार को सरकार  द्वारा चिन्हित किया गया है जिनके घर में कोई कमाऊ सदस्य नहीं है ? क्या द फ़ूड पालिसी रिपोर्ट को सरकार  गंभीरता से नहीं ले रही है ?जिसके आंकड़े बताते हैं कि  भारत में 19 करोड़ की जनसँख्या भूखे पेट सोने को मजबूर है। अगर सरकार इस तरहं की योजनाओं पर विचार नहीं कर रही है तो देश के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक बात और कुछ नहीं है। 

सरकार को  मानवीय आधार पर तत्काल प्रभाव से ऐसी कोई योजना लानी चाहिए जिसमे  अति गरीब परिवार के लोगों को न्यून्तम दाम  पर भोजन उपलब्ध हो सके। या फिर किसी ठोस उपाय से सबसे पहले ऐसे लोगों को चिन्हित किया जाये जो खाने की तलाश में इधर उधर भटकते हैं फिर उनके भोजन की वैकल्पिक व्यवस्था तब तक के लिए किया जाये जब तक वे खुद खान -पान सामाग्री खरीदने में सक्षम नहीं हो जाते। और वे कमाने योग्य बने इसके लिए उनके कौशल विकास के लिए सरकार  को ही योजना बनानी होगी न कि उनके परिवार या रिश्तेदारों के ऊपर निर्भर रह कर वह पूरा होगा। 


यह चिंता का विषय है इसलिए इसे संज्ञान में लेना अति आवश्यक है कि भारत जैसे देश में जो अन्नपूर्णा का देश है ,जो कृषि प्रधान देश के नाम से जाना जाता है वंहा के लोग 3 रुपया किलो मिलने वाले मोटे  चावल के लिए भी तरस रहे हैं और उन्हें जूठ के पत्तल में अपनी भूख की शांति दिखाई दे रही है। 



No comments:

Post a Comment