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Tuesday, 24 April 2018

ग्रो अप !बेटा


(कहानीकार सुरेश वर्मा युवा कवि के साथ- साथ गृह मंत्रालय में अधिकारी भी हैं)

''मैडम कहाँ ले चलूँ"- ऑटो वाले ने बहुत देर तक कोई संकेत
न पाकर पूछा । अनुष्का ने धीरे से टूटे- फूटे रास्ते की और
संकेत किया और धीरे से कहा -'शास्त्री नगर" । 
                       सालों बाद आज अनुष्का छोटे से कस्बानुमा शहर लौट कर आई है । उसके सामने उसके बचपन की स्मृतियाँ चलचित्र की तरह घूमने लगती हैं। ऑटो के रफ्तार के साथ उसकी इस शहर से जुड़ी अमिट स्मृतियाँ भी रफ्तार पकड़ने
लगती हैं ............ "कुटेस्ट एंड मोस्ट ब्यूटीफूल गर्ल ऑफ
दी स्कूल .............. ऑल्वेज़ टोप्पर ऑफ दी स्कूल............
सपनों के पीछे भागने वाली लड़की ............ सब कुछ
छोड़कर आगे बढ़ जाने वाली लड़की ............. "।
                  अचानक एक जानी -पहचानी आवाज उसके कानों से आ टकराती है और बरसों पीछे छूट गया एक चेहरा उसे असहज कर देता है। यह
वही चेहरा था जो दुनियावालों की नजर में कहीं नही था मगर उसके साथ तो हमेशा रहा ......... चाहे
वह मुंबई के चकाचौंध भरी दुनिया मे
रही या अपनी रंगीन कॉर्पोरेट
दुनिया में ........................... उससे एक तार
हमेशा जुड़ा रहा ............ ।
अचानक उसकी आँखें
उस आवाज का पीछा करने लगती है । उसके सामने
वही बचपन का यार विशाल था जो अपनी पत्नी के साथ
एक दो पहिया वाहन से कहीं जा रहा था, वे बेहद खुशी से बातें करते जा रहा था । आज
पहली बार अनुष्का को उसके खुश होने से ईर्ष्या हो रही थी , विशाल की खुशी आज
देखी नहीं जा रही थी वो सोच रही थी आखिर एक इंसान
इतने कम साधनों के होते इतना खुश कैसे रह सकता है
जबकि खुशी के सारे साधन कार, बंगला , हाइ प्रोफ़ाइल
जॉब , नाम- सोहरत तो उसके पास है । सोचकर वह बेहद
तिलमिला उठी , उसे लगा जैसे उसने ऑटो से छलांग
लगाकर विशाल के पीछे बैठी 'औरत' को धकेल
दिया हो और उस जगह पर खुद बैठ गयी हो.............. ।
हाँ , अनुष्का की नजर में वो सिर्फ एक औरत थी ,
जो .........? 
                         इस दिवास्वपन से अनुष्का बाहर भी नही आई
थी की ............ 'मैडम! लो शास्त्री नगर आ गया'...........
ऑटोवाले की आवाज सुनकर उनकी तंद्रा टूटी । आज पहली बार वो अनमने मन से
अपना घर के दरवाजे पर दस्तक दी ............ उसके
आखों से आज बरबस आँसू की धार बह उठी । आज वह
बिलख -बिलख कर रोना चाहती थी किन्तु सामने से
माँ को देख रुमाल से अपना आँसू पोछने लगती है मगर आँसू
अब रुकने वाले कहाँ थे । ''अरे ! बेटा आप रो रहे हो !''
माँ की ये आवाज सुनकर थोड़ी सहज तो हुई मगर
................................
                   आज उसे लगा जैसे एक चेहरे ने उसकी सारी खुशियाँ, शोहरत को निरर्थक कर दिया है। वह किसी से कुछ ज्यादा नहीं बोली ना पहले की तरह
गले लगी , चुपचाप वो अपने कमरे में चली गयी ।पूरा कमरा उसके बचपन से लेकर अब तक के खूबसूरत दास्तानों की तस्वीरों और प्रशस्ति पत्रों से
भरा था ................ आईआईटी टॉपर, ट्वेंटी फाइव लैक
पैकेज ..................... आज वह इन तस्वीरों को कहीं फेंक 
देना चाहती है । उसे आज लगा जैसे वो सपनों के पीछे
भागती चली और उसका हकीकत उससे उतना ही दूर
होता चला गया .......................
                   "अनुष्का बेटा! लो चाय पी लो " ।उसकी माँ उसके पास आकर धीर से उसके बगल मे बैठ कर
बोली । " दुखी क्यों हो बेटा ! अमेरिका जा रही हो तो खुशी होनी चाहिए ,ऐसा अवसर
किसी को कहाँ मिलता है, तुम असाधारण, लकी हो बेटा जो तुम्हें यह अवसर मिला है। हमलोगों से ज्यादा नहीं मिल पायोगी इसलिए
दुखी हो! ................ पता है विशाल भी ये सुनकर
बड़ा खुश हुआ वो आज तुमसे मिलने आ रहा है ,
तुम्हारी सफलता पर सबको गर्व है बेटा "। माँ ने
उसे थोड़ा सहज करने का प्रयास किया मगर विशाल
का नाम सुनकर फिर असहज हो गयी । विशाल का नाम
उसे अतीत के गलियारों मे धकेल
देता है ........................
                    विशाल का उसके
यहाँ आना जाना लगा रहता था । वो जब भी अपने घर आती वो जरूर आता था। उससे जॉब , शहर और बहुत
सारी बातें होती थी । बचपन से बारहवीं तक साथ-
साथ पढ़ाई की थी उनलोगों ने । विशाल भी पढ़ाई
में अच्छा था मगर घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण बारहवीं साइन्स से करने के बाद भी अनुष्का की तरह आगे की पढ़ाई कोटा जा कर नही कर
पाया और वहीं के एक डिग्री कॉलेज मे बीएससी मे
एड्मिशन ले लिया था और घर को भी संभालता था ।
                            बचपन से ही दोनों साथ - साथ पढ़ाई करते थे ।
होली हो या कोई भी पर्व - त्योहार विशाल हमेशा उसके घर आता और हर काम मे हाथ बटाता।
अनुष्का का शहर पहाड़ों से घिरा था और अक्सर
बारिश होती थी और मौसम
खुशनुमा हो जाता था ....................................
                       ऐसा ही एक दिन था , चारों और बादल घिर आया था और ज़ोरों से झमाझम बारिश होने लगी थी ............
अनुष्का अपने छत पर भीग रही थी की नीचे से विशाल
की आवाज आई । नीचे झांक कर देखा तो विशाल
पूरा भीगा हुआ, कीचड़ से सने हुए पैरों के साथ दरवाजे
के पास खड़ा था । अनुष्का ऊपर आने का संकेत देती है।वह तेजी से दौड़ता उप्पर आ जाता है और वह धीरे से अपने पास उसे खींच लेता है और उस बरसात के असंख्य बूंदों के बीच एकाकार हो जाते है .............................
आज दोनों निःशब्द  हैं............. पहली बार दोनों आज
दोस्ती से ज्यादा कैसे आगे बढ़ गए थे
दोनों को पता नही रहा ...........................................
....... । दोनों एक दूसरे को थामे घंटो आसमां की और
देखते रहे ............................... नीरव शांति के बीच
उष्णता का ऐसा प्रबल आवेग उनदोनों ने
कभी नही महसूस किया था । दोनों को आज समय
का भान भी ना रहा। स्कूटर की आवाज सुनकर
दोनों अचानक अलग हो गए थे और विशाल तुरंत
सीढ़ियों से उतर आया था और हकलाते हुए सिर्फ
इतना सा कह पाया था - " हैलो अंकल ! हैलो आंटी !
आज आपलोगों ने बहुत लेट कर दी और वह पहली बार
अपना माथा झुकाये हुए गेट से बाहर चला गया था ।
उसके बाद से विशाल कभी सीधे और सहज रूप से बात नहीं कर पाया था । मगर दोनों एक दूसरे की भाषा समझते थे । अक्सर दोनों की मुलाकात होती और
बातों - बातों मे घंटों बीत जाया करता था।
                   ''अनुष्का बेटा ! पापा पूछ रहे थे की कोई
पसंद आया ? बेटा अब तुम्हारी शादी की उम्र हो गयी है । आखिर कब तक अकेले रहोगी । ''माँ
फिर उसके कमरे मे आती है और उसको खाना खाने के
लिए साथ चलने को संकेत करती है तब जाकर वो पुनः अपने अतीत से वापस आती हैं। वह आज कुछ जबाब नहीं देती है और खाना खाने के बाद वो फिर
अपने कमरे मे आकर निढाल अपने बिस्तर पर लुढ़क
जाती है और बरबस आँसुओ की गिरफ्त में आ जाती है ।
अतीत उसको अपने आगोश मे खींच लेता है .................
अनुष्का का फोर्थ सेमेस्टर खत्म
हो चूका था । अन्य दिन की तरह आज भी विशाल का फोन आया था मगर आज वह  उतने अच्छे से बात नही कर रहा था । " मेरे मम्मी -पापा मेरी शादी कर देना चाहते हैं अनुष्का, आखिर मैं
तुम्हारे अलावे किसी और से कैसे .................... ?
इतना कहकर उसका फोन कट जाता है। अनुष्का बड़ी मुश्किल से ये बात अपने माँ से कह
पाती है। " आखिर विशाल की औकात क्या है ,
की तुम्हारे संग आगे की सोचे ................. तुम साधारण
नही रहे बेटा , और असाधारण का साधारण के साथ
कैसे मेल हो सकता है ............. कहाँ तुम आईआईटीयन और वो ?तुम्हारी दोस्ती का नाजायज फायदा उठाना चाहता है विशाल
। ग्रो अप बेटा ! हमलोग मर कर भी इस रिश्ते
को स्वीकार नही करेंगे"। गुस्से में उसकी माँ सब कुछ बोल गयी थी और फोन कट कर दिया था।अनुष्का का विश्वास
नहीं हो रहा था की उसका कुछ बन जाना उसको उसकी ही जड़ों से काट देगा। बाद में
उसके घरवालों ने विशाल को बहुत भला बुरा कहा था फिर भी अनुष्का की राय जानने
की लिए उसने फिर से फोन किया था और मगर इस बार
अनुष्का ने ही कोई निश्चित आश्वासन नहीं दिया
था और उसके जुबान से भी एक शब्द अकस्मात निकल
पड़ा था " ग्रो अप विशाल ,वी आर सिंपली फ्रेंड "!
                फिर अनुष्का कॉलेज की रंगीन दुनिया मे खो गयी ,
अपनी हैसियत से बराबरी वाले तारों से जुडने का प्रयास करने लगी और वक़्त के साथ विशाल से भी ज्यादा केयरिंग , हैंडसम मिले मगर अनुष्का के लाख
समर्पण के बाद भी कोई ऐसा तार नहीं मिला जिसके सहारे ज़िंदगी की नाव को हमेशा
के लिए बांधा जा सके । इसी आशा में की ,कोई ऐसा
जरूर मिलेगा जो ................ इसलिए बहुतों से
जुड़ी मगर सब सपनों के सौदागर निकले । सब ने एक
ही सीख दी " ग्रो अप अनुष्का! "           

                  ज़िंदगी का तार टूटता चला गया बहुत मिले मगर सब सिर्फ वहीं तक सीमित रहे ...................
                सूर्य की लालिमा युक्त किरण खिड्कियों के सुराख से
अनुष्का के चेहरे को रोशन कर रही है । आँखों के चारों और काली रेखाएँ स्पस्ट नजर आ रही हैं ।माँ आहिस्ते से उसके कमरे मे दाखिल होती है और जागने का संकेत देती है । अनुष्का सीधे गुसलखाने की और रुख करती है और इतना कह पाती है -"विशाल
को छोटू से कहलवा देना की मुझे आज बहुत काम है वो मिलने के लिए ना आए । "
               आज अनुष्का शांत है, अपने आप को सहज रखने का प्रयास करती है। मिलनेवालों से अच्छे तरीके से मिलती है, खुश नहीं है वो फिर से उसी रंगीन मगर उजाड़ दुनिया मे वापस जाने के।लिए अभिशप्त है । शहर खुश है की अनुष्का उस शहर की
बेटी है जो अब अमेरिका जाएगी और बधाइयाँ देने वालों का तांता लगा हुआ है । कुछ रिपोर्टर भी आ गए हैं। " सफलता और खुशी दोनों दो अलग चीजें है। सिर्फ सफलता खुशी का पैमाना नहीं है। " एक रिपोर्टर से । आपका पसंदीदा गाना - "किसी नजर को तेरा इंतजार आज भी है "।
                मम्मी - पापा के साथ
विशाल भी उसे एयरपोर्ट छोड़ने आया है । सबके खुशी का ठिकाना का नहीं है । माँ अखबार
की हैड्लाइन्स " इस शहर की होनहार बेटी होगी अमेरिका रवाना " दिखाते हुए खुश होती है।
मगर, अनुष्का को इसमें कोई रुचि नहीं है । वह एकटक
रास्ते को निहारते जा रही है । बीच - बीच में विशाल को देख लेती है । अब वो विमान के सीट पर बैठ चुकी है और बिमान टेक ऑफ करने वाली है , अनुष्का विंडो से एकटक देख रही है और पलभर में आसमां मे कहीं गुम हो जाती है उसके आंखों में एक आँसू के बून्द आहिस्ते से उसके गालों से उतरकर लुढ़क जाता है.........
                

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