Wednesday, 18 April 2018
उच्च शिक्षा में आदर्शवाद का क्षरण
सुरेश वर्मा
(लेखक दिल्ली विवि के पूर्व -छात्र रह चुके हैं। गृह मंत्रालय,भारत सरकार में अधिकारी हैं। आप यूजीसी-नेट भी हैं)
आये दिन उबलते जेएनयू, ओस्मानिया, कश्मीर विश्वविद्यालय इत्यादि को देखते हुए यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं होगी कि शिक्षा के ये उच्च केंद्र छात्रों को आदर्शवाद की जगह स्याह,बिखण्डनकारी राजनीति की ओर धकेल रहा है। भारत के विश्वविद्यालयों को एक ऐसा फूल होना चाहिए जिसकी सुंगध पाकर भारत की विविध संस्कृतियाँ एक साथ अस्तित्व में रह सके। इसे भारत को जोड़ने की भूमिका का निर्वाह करना चाहिए।
भूपेन हजारिका ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि किस तरह बीएचयू ने उनके अंदर क्षेत्रीय भावना की जगह राष्ट्रीयता और अखंडता की भावना का विकास किया था और उन्होंने इसके लिए इस विश्वविद्यालय के प्रति कृतज्ञता व्यक्त किया था। विश्वविद्यालयों को नकारात्मक ऊर्जा का केंद्र नहीं होना चाहिए। अगर विवि भी राजनीतिक अखाड़ा बन जायेगा और राजनीतिक कार्यकर्ता जिस तरह से सड़कों पर हुड़दंग करते हैं अगर यही इन विवि परिसरों में भी होने लगेगा तो आखिर आदर्शवाद और सकारात्मक ऊर्जा की अपेक्षा किस संस्थान से किया जाएगा? आखिर देश के नौनिहालों के मस्तिष्क सृजन का कार्य कौन करेगा?
जहाँ तक परिसर में राजनीतिक गतिविधियों का सवाल है तो राजनीति का फलशफ़ा ही ऐसा है कि वहाँ हर वाद का प्रतिवाद है। किसी मुद्दे पर पूर्ण सहमति का बन पाना नामुमकिन है।
वैसे भी राजनीति में प्रवेश में किसी की मनाही नहीं है। ऐसे में विवि परिसर के अंदर राजनीति करना गैर-जरूरी और अनावश्यक प्रतीत होता है। कुछ लोगों का मानना है कि विवि छात्रों के कारण ही स्वतंत्रता आंदोलन सफल हुआ था। इस बात में सच्चाई है मगर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उस समय समाज में राजनीतिक गतिशीलता शून्य के बराबर थी।साथ ही,उस समय हम सब किसी अन्य राष्ट्र के अधीन थे ऐसे में छात्रों का राष्ट्र की आजादी के लिए भाग लेना आवश्यक और जरूरी था।
आज की परिस्थिति अलग है। आज हमारे पास विधायन और शासन हेतु चुनी हुई जनप्रतिनिधि है और उनके मुद्दों के वाद-विवाद के लिए संसद है। कानूनी उपचार के लिए न्यायालय है। राजनीतिक गतिविधियों के लिए पूर्ण स्वतंत्रता है। ऐसे में विश्वविद्यालय परिसर को राजनीति अखाड़ा बनाना निहायत गैर-जरूरी है। हाँ! जिन छात्रों को राजनीति करनी है वे किसी पार्टी की सदस्यता लें या स्वतन्त्र रूप से इसके लिए विश्वविद्यालय परिसर के बाहर अपनी गतिविधि चलायें इसके लिए मनाही नहीं होनी चाहिए और ऐसी मनाही है भी नहीं। ऐसे में विवि में राजनीतिक गतिविधियों पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है।
भारत जैसे जनसंख्या विस्फोटक राष्ट्र जहाँ आज भी मूलभूत सुविधाओं का नितांत अभाव है ऐसे में भारत को ऐसे युवाओं की जरूरत है जो तकनीक और अनुसंधान करके किफायती कीमत पर मिलने वाली दवाईयाँ,यंत्र,औजार, तकनीक तैयार करे जिससे यहाँ के विशाल जनसमुदाय का जीवन उन्नत हो सके। इसके लिए प्रथम शर्त है कि विश्वविद्यालओं में शांति का वातावरण हो और अनुसंधान जैसे विषयों पर सरकार और अध्यापक ज्यादा ध्यान दें। राजनीतिक आजादी हम सबको सुलभ हो चुकी है। असल आजादी हम युवाओं के हाथ है जो अपने कुशाग्र बुद्धि और अनुसन्धान से गरीबी,बेरोजगारी,
बीमारी इत्यादि मानवीय समस्याओं से निजात दिलाए ।
'जो कहो हम ही सच्चे हैं' वाले जुमले और राजनीतिक हठधर्मिता अगर विवि परिसरों में भी गुंजायमान होने लगेगा तो ऐसे में सम्भव है कि छात्रों को जिस तार्किकता बोध कराने के उद्देश्य हेतु विवि स्थापित किये गए हैं, यह मूल आधार ही कमजोर हो जाएगा। मस्तिष्क विस्तार और दुनिया को अपने तरीके से समझने,हर वाद-प्रतिवाद को अध्ययन कर माध्यम से समझने की जो चाहत लेकर छात्र इन संस्थानों में प्रवेश करते हैं। वह इन वाद-प्रतिवाद के कोलाहल में कहीं दब जाएगा।
शिक्षा मानव समुदाय की सबसे बड़ी खोज है, प्रक्रिया है जिससे ज्ञान का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरण होता है साथ ही, यह मानसिक क्षमता का विस्तार करके नए आविष्कार, खोजों से मानव जीवन को सुलभ बनाना होता है। आदर्शवाद मानव को नैतिकता युक्त होकर सही राह पर चलना सिखाता है।
जहाँ देखो वहाँ युवाओं के हाथों में हथियार है। क्या उन्हें राष्ट्र के सृजन में ध्यान नहीं देना चाहिए। और, सृजन मानसिकता का विकास क्या शेक्षणिक संस्थायों का काम नहीं है? क्या विश्वविद्यालयों को अपनी निष्पक्ष शैक्षणिक माहौल बनाये रखना होगा इसके लिए जरूरी है कि इसे गैर शिक्षण-अध्यापन गतिविधियों से मुक्त रखा जाय। अन्यथा इन शिक्षण संस्थानों का मखौल उड़ता रहेगा और छात्र अपने -अपने जातिगत,क्षेत्रगत,धर्मगत मुद्दों को लेकर आये दिन इन उच्च शिक्षण संस्थानों का बंटाधार करते रहेंगे।
1 comment:
तहकीकात डिजिटल मीडिया को भारत के ग्रामीण एवं अन्य पिछड़े क्षेत्रों में समाज के अंतिम पंक्ति में जीवन यापन कर रहे लोगों को एक मंच प्रदान करने के लिए निर्माण किया गया है ,जिसके माध्यम से समाज के शोषित ,वंचित ,गरीब,पिछड़े लोगों के साथ किसान ,व्यापारी ,प्रतिनिधि ,प्रतिभावान व्यक्तियों एवं विदेश में रह रहे लोगों को ग्राम पंचायत की कालम के माध्यम से एक साथ जोड़कर उन्हें एक विश्वसनीय मंच प्रदान किया जायेगा एवं उनकी आवाज को बुलंद किया जायेगा।
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आपकी लेखन बहुत ज्ञानवर्धक है। सही तरीके से सभी बिश्वविद्यालयों के द्वारा शिक्षण प्रणाली को लागू कर इसे अमल में लाया जाए तो हमारे देश का भविष्य में सुधार अवश्य आ सकता है।
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