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Wednesday, 15 April 2020

मंदी, बंदी, बेरोजगारी और प्रउत

लेखक - राजेश सिंह
सदस्य, प्रउत ग्लोबल

        मंदी, बंदी, बेरोजगारी और प्रउत

27 मार्च, 2020 को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की अध्यक्ष क्रिस्टालिना जार्विवा ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के मंदी में प्रवेश कर जाने की आधिकारिक घोषणा कर दी। इसके साथ ही पूंजीवाद के तमाम पैरोकार इस आसन्न मंदी का ठीकरा कोरोना वायरस से उत्पन्न स्थितियाँ, औद्योगिक गतिविधियों का ठप्प होना और लॉकडाउन आदि पर फोड़ना शुरू कर दिया।

वित्तीय वर्ष 2018-19 और 2019-20 में दुनियाभर की अर्थव्यवस्था में आई सुस्ती, मंदी के दरवाजे पर लगातार दस्तक दे रही थी, किन्तु पूँजीवाद के पैरोकार इस सच्चाई से लगातार मुंह चुरा रहे थे। 2008 के अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार विजेता पॉल क्रुगमन ने, 2019 के अंत या 2020 के शुरू में मंदी की बात को साफ साफ शब्दों में फरवरी, 2019 में कहा। इस तथ्य की पुष्टि भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने मार्च, 2019 में की। राजन ने एक कदम आगे बढ़ते हुए कहा, 'पूंजीवाद अपने जीवन काल के सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रहा है।'

साथ ही, तमाम रेटिंग एजेंसीयां दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं और वैश्विक विकास दर को लगातार कम करती जा रहीं थीं। इन्हीं के बीच, संयुक्त राष्ट्र संघ व्यापार और विकास सम्मेलन (UNCTAD) ने भी सितंबर, 2019 में सम्भावित मंदी की बात कही। परन्तु, पूंजीवाद के पैरोकारों के कान पर जूँ नहीं रेंगना था और न ही रेंगा।

किसी भी अर्थव्यवस्था में, तिमाही दर तिमाही, विकास दर (GDP) का लगातार घटते जाना, आर्थिक मंदी का बड़ा संकेत माना जाता है। मंदी की इस प्रक्रिया की शुरुआत उपभोक्ता वस्तुओं के खपत में कमी से होती है। उपभोक्ता वस्तुओं के खपत में यह कमी उत्पादन को प्रभावित करती है। उत्पादन कम होने से आर्थिक गतिविधियां कमजोर होने लगती हैं और औद्योगिक इकाईयां धीरे धीरे बन्द होने लगती हैं। औद्योगिक इकाइयों की बंदी के कारण लोगों का रोजगार छिनने लगता है, जिससे लोगों की क्रय क्षमता या उत्पाद खरीदने की शक्ति कम होती जाती है। इस कठिन दौर में, भविष्य की आशंका से ग्रसित, लोग अपना पैसा बैंक में जमा करने के बजाय अपने पास रखना ज्यादा सुरक्षित समझते हैं, जिससे बाजार की मौद्रिक स्थिति (Liquidity Crunch) खराब होती जाती है। यह एक ऐसा कुचक्र है जिसमें उत्पादनकर्ता से लेकर उपभोक्ता, सभी आर्थिक रूप से पिसने के लिये बाध्य रहते हैं।

आर्थिक मंदी के इस कुचक्र का बीजमंत्र पूंजीवादी व्यवस्था में ही निहित है। प्रत्येक वर्ष जनवरी माह में स्विटजरलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक मंच (WEF) की बैठक होती है जिसमें तकरीबन 3000 लोग शामिल होते हैं। इसमें दुनियाभर के दिग्गज राजनेता, उद्योग जगत के महारथी, अर्थशास्त्री और पत्रकार आदि इकठ्ठा होकर विश्व को बेहतर बनाने की चर्चा करते हैं। इसी समय, ऑक्सफैम इंटरनेशनल भी दुनिया में बढ़ती गरीबी एवम अमीर और गरीब के बीच बढ़ती असमानता के आंकड़े जारी करती है।

ऑक्सफैम द्वारा 2019 में जारी आंकडों ने बताया कि, दुनिया के सिर्फ 26 लोगों की व्यक्तिगत सम्पत्ति दुनिया की आधी गरीब आबादी की सम्पत्ति के बराबर है। 2020 के आंकड़े कहते हैं कि दुनिया की 1% आबादी के पास 99% आबादी से दुगनी सम्पदा है। और भारत वर्ष में 1% लोगों के पास 70% आबादी (95 करोड़) की सम्पदा से चार गुणा अधिक है। अभी पिछले ही सप्ताह फोर्ब्स ने दुनिया के अति धनाढ्य 2095 लोगों की सूची जारी की है जिनकी व्यक्तिगत सम्पत्ति आठ ट्रिलियन डॉलर है। भारतीय रुपये में यह सम्पत्ति ₹610,000,000,000,000.00 (छह करोड़ दस लाख करोड़ रुपया) होता है। व्यक्तिगत धन संचय की यह असीमित छूट ही आर्थिक मंदी की मुख्य वजह है।

यक्ष प्रश्न यह है कि सुरसा की भांति मुंह बाये खड़ा इस आर्थिक मंदी से कैसे निपटा जाय और भविष्य में आर्थिक मंदी न हो इससे कैसे बचा जाय। इस समस्या के मूल जड़ पूंजीवादी व्यवस्था से कोई भी उम्मीद बेमानी होगी। इससे उबरने का एकमात्र रास्ता भारत वर्ष के महान दार्शनिक, चिंतक और अर्थशास्त्री श्री प्रभात रंजन सरकार ने सामाजिक आर्थिक दर्शन 'प्रगतिशील उपयोग तत्त्व (प्रउत)' के माध्यम से दिया है। उन्होंने राजनैतिक लोकतंत्र की बजाय आर्थिक लोकतंत्र और केन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था की जगह विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था को अपनाने की वकालत की है। आज चीन दुनिया का उत्पादन हब बना हुआ है किंतु सप्लाई श्रृंखला के ध्वस्त हो जाने के कारण दुनियाभर के देशों में उत्पादित वस्तुओं के साथ साथ चिकित्सा उपकरणों की बेहद कमी महसूस की जा रही है। प्रउत का सिद्धांत भारत वर्ष को 44 और दुनिया को 245 सामाजिक आर्थिक क्षेत्र में बांटकर; जो समान आर्थिक समस्या, समान आर्थिक क्षमता, भाषा, सांस्कृतिक विरासत और भौगोलिक समरूपता के आधार पर बने होंगे, का ब्लॉक स्तर से विकास शुरू कर कृषक सहकारिता तथा उत्पादन सहकारिता के माध्यम से उत्पादन और वितरण सहकारिता के माध्यम से वितरण का मार्ग सुझाया है। इस आर्थिक प्रक्रिया को अपनाकर 100% रोजगार समायोजन का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।

विकास की इस प्रक्रिया में, स्थानीय आर्थिक उपक्रमों में स्थानीय लोगों को रोजगार में प्राथमिकता देने की बात भी प्रउत करता है। आज यदि प्रउत आधारित अर्थव्यवस्था होती तो लाखों लाख मजदूरों का यह जो पलायन हुआ है, ऐसी स्थिति नहीं आती। असीमित धन संचय पर अंकुश लगाकर धन को चलायमान रखने की बात भी प्रउत कहता है, जिससे कि धन की अंतर्निहित क्रय शक्ति लगातार बढ़ती रहे और जनमानस अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ साथ, उत्तरोत्तर समृद्धि की ओर अग्रसर होते रहें।


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