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Saturday, 25 April 2020

पंचायती राज, पूंजीवाद और प्रउत

राजेश सिंह
सदस्य, प्रउत ग्लोबल
     
        पंचायती राज, पूंजीवाद और प्रउत

वर्ष 1992 में 73वें संविधान संसोधन के द्वारा पंचायती राज की कल्पना को अमलीजामा पहनाया गया। यह त्री-स्तरीय व्यवस्था है जो; ग्राम पंचायत, मंडल परिषद या पंचायत समिति और जिला परिषद स्तर पर कार्य करती है, जिसका लक्ष्य ग्रामीण इलाकों का समुचित विकास करना था। आज दिनांक 24 अप्रैल, 2020 को पंचायती राज दिवस पर ग्राम प्रधान, मंडल प्रधान और जिला परिषद अध्यक्षों को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गाँवों को स्वालम्बी बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी न सिर्फ वाक कला में निपुण हैं, वरन अवसर के अनुकूल बोलना और अवसर को भुनाना भी उन्हें बखूबी आता है। मई 2014 के पूर्व वह आधार कार्ड, वस्तु और सेवा कर (GST) तथा खुदरा क्षेत्र में विदेशी पूंजी निवेश का पुरजोर विरोध कर रहे थे और प्रधानमंत्री बनते ही उन्होंने यू-टर्न ले लिया और इन सभी मुद्दों के पैरोकार बन बैठे।

ज्यादा पुरानी बात नहीं है, 30 सितम्बर 2018 को आणंद, गुजरात में अमूल की चॉकलेट फैक्ट्री के उदघाटन के वक़्त कहा; 'एक तरफ समाजवादी अर्थरचना है और दूसरी तरफ पूंजीवादी अर्थरचना। एक तरफ सरकार के कब्ज़े वाली अर्थव्यवस्था है तो दूसरी तरफ धन्ना सेठों के कब्जे वाली अर्थव्यवस्था। दुनिया इन्हीं दो अर्थव्यवस्थाओं से परिचित रही है। सरदार साहब जैसे महापुरुषों ने उस बीज को बोया जो आज तीसरी अर्थव्यवस्था का नमूना बनकर उभरा है, जिसपर न तो सरकार का कब्ज़ा है, न धन्ना सेठों का कब्ज़ा होगा। वह सहकारिता आंदोलन होगा।' सहकारिता की व्यवस्था का गुणगान किये आज अठारह महीने से ज्यादा का समय हो गया, परन्तु देश ने सहकारिता के विकास के संदर्भ में फिर कुछ नहीं सुना।

हर वर्ष तकरीबन 12,000 किसानों द्वारा आत्महत्या, यह हलफनामा केंद्र की सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में दिया था, और ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में शहरों को पलायन, पंचायती राज की असफलता की कहानी कहती है। जैसे देश की आज़ादी का फायदा गिने चुने औद्योगिक घरानों और राजनेताओं को मिला, वैसे ही पंचायती राज का फायदा भी चंद भ्रष्ट राजनैतिक परिवारों को ही मिला।

वर्ष 1760 से शुरू हुई औद्योगिक क्रांति की यात्रा ने दुनिया को समृद्धि के बड़े बड़े सपने दिखाये थे। परन्तु आज 260 वर्षों के बाद दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी अत्यधिक गरीबी में जीने के लिये बाध्य है। 1% लोगों के पास 99% आबादी की तुलना में दुगनी सम्पदा है। साथ ही, इस औद्योगिकरण ने एक ओर हवा एवम पानी को प्रदूषित किया तो दूसरी ओर जंगल एवम पहाड़ को काटकर पूरे पर्यावरण को चौपट कर दिया। आज हमसब एक विषाक्त वातावरण में जीने के लिये बाध्य हैं।
20 अप्रैल, 2020 को वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट में कच्चे तेल की कीमत धराशायी होकर, इतिहास में पहली बार, -37$ प्रति बैरल के ऋणात्मक (-ve) कीमत पर जा पहुंची। अर्थात, तेल भी मुफ्त में लो और साथ में पैसे भी। लॉकडाउन, औंधे मुंह गिरा शेयर बाजार और अब कच्चे तेल की कीमत के धराशायी होने से पूंजीवाद की खोखली जड़ें अंदर तक हिल गयी है, जिसका सिर्फ भर भराकर गिरना भर शेष है।

अमेरिका और यूरोप के देश, जो पूंजीवाद के सशक्त पैरोकार रहे हैं, आज स्थानीय उत्पादन और स्थानीय लोगों को नौकरी देने की बात करने लगे हैं। अमेरिका ने अपने यहां 2.60 करोड़ लोगों की नौकरियाँ छीन जाने के बाद अप्रवासी अकुशल, कुशल मजदूरों के साथ साथ H-1B वीसा वाले अतिकुशल लोगों को भी बाहर का रास्ता दिखाने की तैयारी में है। धीरे धीरे, सभी देश यही रास्ता अपनाने वाले हैं।

भारत वर्ष की स्थितियाँ भी अच्छी नहीं हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव के पूर्व, केंद्र सरकार के संगठन राष्ट्रीय सैंपल सर्वे आर्गेनाइजेशन (NSSO) ने जब कहा कि देश पिछले 45 वर्षों में बेरोजगारी के उच्चतम स्तर पर है, तो इस आंकड़े को सार्वजनिक होने नहीं दिया गया। 26 जनवरी, 2020 को देश के अखबारों की सुर्खियां थी कि पिछले पांच वर्षों में, देश की अग्रणी सात क्षेत्रों में तकरीबन चार करोड़ नौकरियां जा चुकी हैं। कोरोना लॉकडाउन के बाद यह अंदाजा लगाना भी मुश्किल है कि कितने करोड़ लोगों का रोजगार छिन चुका है और आसन्न मंदी कितने करोड़ लोगों की नौकरियों की और बलि लेगा।

केंद्र की वर्तमान मोदी सरकार बात चाहे जितनी मर्ज़ी कर ले परन्तु उसके पिटारे में भी देने के लिये कुछ नहीं है। साथ ही, सरकार धन उगाहने या बचाने का कोई मौका नहीं चूक रही है। कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार गिर रही हैं और सरकार उत्पाद कर आदि बढ़ाकर लगातार पैसों की उगाही कर रही है। इसी वर्ष जनवरी में केंद्रीय कर्मचारियों के लिये 4% महंगाई भत्ता की घोषणा की गई थी जिसका लाभ कार्यरत 38.34 लाख कर्मचारी और 65.26 लाख पेंशन धारकों को मिलता। सरकार ने 1.13 करोड़ लोगों की जरूरतों पर तुषारापात करते हुऐ, दिये जाने वाला 37,530 करोड़ रुपया बचा लिया। संविधान में वर्णित कल्याणकारी सरकार का विद्रूप चेहरा साफ साफ दिख रहा है।
आसन्न परेशानियों और भविष्य पर मंडराते काले बादल के बीच आशा की एकमात्र सुनहली किरण श्री प्रभात रंजन सरकार प्रदत्त सामाजिक आर्थिक दर्शन 'प्रगतिशील उपयोग तत्त्व (प्रउत)' है। पूंजीवाद के केन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था के बिल्कुल उलट, प्रउत विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था की वकालत करता है। विकास की प्रक्रिया ऊपर से नीचे नहीं बल्कि नीचे, ग्राम / प्रखंड स्तर, से ऊपर की ओर जाता है और हर ग्राम तथा प्रखंड को स्वालम्बी बनाने का मार्ग दिखाता है। हर सुदृढ़ और स्वालम्बी गांव तथा प्रखंड, जिला और फिर समाज, राज्य एवम समग्र देश की समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है।

प्रउत की अर्थव्यवस्था में, स्थानीय उपक्रमों में स्थानीय लोगों को रोजगार में प्राथमिकता देने की पुरजोर वकालत करता है। आज यदि लोग अपने क्षेत्र में कार्यरत होते तो मजदूर पलायन की इस विकट समस्या से हमें दो चार नहीं होना पड़ता। इसके अतिरिक्त, देश से निकलकर अन्य देशों में कार्यरत 1.75 करोड़ अप्रवासी भारतीयों की नौकरियां भी खतरे में हैं। इन अप्रवासी लोगों ने 2018 में 78.6 बिलियन डॉलर, अर्थात 5,50,000 करोड़ रुपया, देश में भेजा था। इन 1.75 करोड़ लोगों में शायद कुछ लोग ही अपनी नौकरियां बचा पायेंगे। यह, एक तो करेला दूजे नीम चढ़ा वाली बात हो गयी, कि देश के अंदर लोगों के लिये रोजगार है नहीं और इसमें 1.75 करोड़ लोगों का अतिरिक्त भार।

आसन्न मंदी, बेरोजगारी की समस्या का 100% समाधान, विकास और समृद्धि की यात्रा में सबकी सहभागिता आदि का एकमात्र हल प्रउत ही है। प्रउत को समग्रता में अपनाये बगैर न तो देश की अर्थव्यवस्था बचेगी और न ही वैश्विक अर्थव्यवस्था।

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