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Sunday, 2 August 2020

आनंदमार्ग प्रचारक संघ के प्रवर्तक श्री श्री आनन्दमूर्ती जी आज के ही दिन 2 अगस्त 1978 को पाटलिपुत्र बांकीपुर जेल से रिहा हुए थे

कृपा शंकर चौधरी

आनंदमार्ग प्रचारक संघ के प्रवर्तक  श्री श्री आनन्दमूर्ती जी आज के ही दिन 2 अगस्त 1978 को पाटलिपुत्र बांकीपुर जेल से रिहा हुए थे

प्रयागराज। आनंद मार्ग प्रचारक संघ 593 A ममफोर्डगंज प्रयागराज में मासिक बाबा नाम केवलं का अखंड कीर्तन के साथ साधना एवं स्वध्याय हुआ।डायोसिस सचिव आचार्य संजीवानंद अवधूत जी ने बताया...
आनंदमार्ग प्रचारक संघ के प्रवर्तक  श्री श्री आनन्दमूर्ती जी आज के ही दिन 2 अगस्त 1978 को पाटलिपुत्र बांकीपुर जेल से सभी आरोपित दोषो से मुक्त न्ययालय द्वारा सम्मान पूर्वक रिहा हुए थे।2अगस्त को ही पांच साल छह महीने चार दिन के  उपवास करने के उपरांत बड़ी बहन हीरा प्रभा के हाथों से उपवास तोड़ें।जेल से रिहा होने के समय हजारो आनंद मार्गी साधक,भक्तगण पटना गांधी मैदान से जुलूस के साथ नारे लगाते हुए महासंभुति के स्वागत में विराजमान थे।वो दिन इतिहास में हमेशा हमेशा यादगार रहेगा।आगे उन्होंने कहा ...
श्रावणी पूर्णिमा के शुभ अवसर पर* सबों को मेरा नमस्कार!!
3 अगस्त 2020 को *श्रावणी पूर्णिमा* है। यह तिथि हम आनन्द मार्गियों के लिये एक खास महत्व रखता है।
बात 1939 की है। हमारे परमाराध्य *बाबा*(आनंदमूर्ति जी) तब सिर्फ़ 18 वर्ष की आयु में थे और कलिकाता के ईश्वरचन्द्र विद्यासागर कालेज में 12वीं कक्षा में अध्ययनरत थे। *बाबा* प्रतिदिन अपनी दिनचर्या के अनुसार हुगली नदी के तट पर सैर करने जाते थे और शाम होने पर लौट आते थे। श्रावणी पूर्णिमा का दिन कुछ विशेष था। *वे* सैर के दौरान काशीमित्र घाट पर कुछ देर ठहर गये, मानों *उन्हें* किसी से मिलना था। शाम हो गयी थी। चारों ओर अन्धकार छा चुका था। लेकिन कुछ ही देर में चन्द्रमा सोलह कलाओं में पूर्ण अपनी शुभ्र चांदनी की आभा बिखेरते हुये क्षितिज पर उभर आयी। रात्रि के प्रथम प्रहर की कालिमा चांदनी की शुभ्र रौशनी पाकर वातावरण को चहुं ओर आलोकित करने लगी।  सबकुछ अब स्पष्ट दिखने लगा था। हुगली नदी के जल में चांद स्पष्ट दिख रहा था। पानी स्थिर था, क्योंकि नाव का आवागमन शाम होने के पहले ही बन्द हो चुका था। चारों ओर निरवता पसरी हुयी थी। काशिमित्र घाट जन शुन्य हो चुका था। लेकिन *बाबा* उस दिन बीत रहे संध्याकाल में मानों किसी के इन्तजार में वहां ठहरे हुये थे। चांदनी की आभा में *उनका* सफेद कुर्त्ता-धोती स्पष्ट दिख रहा था। निरवता को चीरते हुये दिल दहला देने वाली आवाज अनायास वातावरण में गूंज उठी। 'कौन?' 'ठहरो?' *बाबा* प्रतिउत्तर देते हुये आवाज देकर कहते हैं- 'कालीचरण' आओ! *मैं* कबसे तुम्हारा इन्तज़ार कर रहा हूं!! कालीचरण *बाबा* के सुमधुर और विश्वास भरा प्रतिउत्तर को सुनकर कुछ क्षणों के लिये ठिठक जाता है। विस्मय में पड़ जाता है। आखिर, यह कौन हो सकता है जो मेरा नाम लेकर मुझे सम्बोधित कर रहा है? मेरा तो इस दुनिया में कोई शुभचिंतक नहीं। मैंने तो आजतक सबको लूटा है। मुझसे सीधी तरह पेश नहीं आनेवालों का मैंने कत्ल किया है। इसी उधेड़बुन में पड़े एक विशालकाय कृष्णवर्ण का देहधारी मनुष्य कुछ ही क्षणों में अत्यन्त आक्रामक अंदाज में सामनेवाले का सबकुछ छीन लेने के ख्याल से *बाबा* के पास आ धमका। *बाबा* प्यार और स्नेह से उसे समीप बैठने के लिये कहा। कालीचरण बैठ जाता है। दोनों की गुफ्तगू आरम्भ होती है। *बाबा* उसके बारे में सहृदय अपनापन के साथ उसे सबकुछ बताते हैं। उसके परिवार के बारे में, उसके अतीत के कुकृत्यों के बारे में आदि। कालीचरण सब सुनकर अत्यन्त ही अभिभूत होकर *बाबा* के चरणों में लुढ़क जाता है। आंखों से अविरल अश्रु प्रवाह झरने लगता है। मानों, पहली बार इस जीवन में किये गये सारे अपराधों का प्रायश्चित उसे आज हुआ था। *बाबा* उसे उठने को कहते हैं और नदी में स्नान करने को कहते हैं। कालीचरण का हृदय बदल चुका था। अब वह ढीठ और खूंखार दस्यु नहीं बल्कि एक अबोध शिशु की भांति सरल मन वाला व्यक्ति बन चुका था। वह हुगली नदी में स्नान करके *बाबा* के पास आकर बैठ गया। *बाबा* ने उसे अध्यात्म ज्ञान की 'दीक्षा' दी, मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया और गुरु के रूप में दक्षिणा मांगा लेकिन उसके पास उस दिन कुछ भी नहीं था गुरुदेव को दक्षिणा देने के लिये। लेकिन शुरू में *बाबा* के सान्निध्य में आने से पहले उसके मन में *बाबा* से सबकुछ लूटने का मन था। तो दक्षिणा के लिये उसके मन के असमंजस दूर करते हुये *बाबा* अपने जेब से एक सिक्का निकालकर उसके हाथ में देते हुते कहते हैं कि यह लो और गुरु दक्षिणा दो। वह विस्मित था। उसके मन की सभी बातें *बाबा* जानते थे यह उसे मालूम हो चुका था। अत्यन्त ही भावुक हो कर वह उस मुद्रा को दक्षिणा के रूप में *बाबा* को समर्पित किया और *बाबा* ने उसे स्वीकार किया।
कालीचरण अब पूर्ण रूप से बदल चुका था। अब वह आतंकी या अपराधी नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक साधक बन चुका था। इस प्रकार कालीचरण की दीक्षा आनन्दमार्ग में प्रथम दीक्षा माना जाता है जिसके लिये इस शुभ दिन का महत्त्व है और प्रत्येक वर्ष हमलोग मनाते हैं। यही आगे चलकर 'कालिकानन्द' के रूप में *बाबा* की सेवा में सदैव समर्पित रहे।
 दीक्षा ग्रहण करने के उपरान्त कालीचरण के सामने जीवनयापन का प्रश्न था क्योंकि तब वह उस क्षेत्र में नहीं रह सकता था। उसके साथ उसकी बहन रहती थी जिसका व्याह करना अभी बाकी था। इसलिये आजीविका चलाने और एक सामान्य इंसान की ज़िंदगी जीने के लिये *बाबा* ने उसे लातेहार (वर्त्तमान झारखण्ड) में जाकर लकड़ी का काम करने को कहा था और उसने वैसा ही किया।उसके पश्चात जीवन दानी संन्यासी बन कर आचार्य कालिकानंद अवधूत नाम से प्रसिद्ध हुए
आज से ही एक नई सभ्यता की नींव डाली गई जो आज पूरे विश्व स्तर पर आनंद मार्ग दर्शन का प्रचार प्रसार हो रहा है।सभी योग ध्यान ,आसान निःशुल्क ग्रहण कर सकते है।
इस अवसर पर सभी भक्त जनों को श्रावणी पूर्णिमा की शुभकामना के साथ हार्दिक अभिनंदन।
आचार्य राघवानंद अवधूत,आचार्य शुभगतानंद अवधूत, डॉक्टर महेंद्र जी,महेंद्र  जी ,प्रतिक जी एवं सुशील कुमार जी की सराहनीयउपस्तिति के कारण कार्यक्रम सफल रहा।
नोटः दिनाँक 3अगस्त2020 सायं 4.00 बजे श्रावणी पूर्णिमा के अवसर पर आनंदमार्ग प्रचारक संघ के पुरोधा प्रमुख का ऑनलाइन प्रवचन प्रसारित होगा।सभी समय पर उपस्थित रहे एवं लाभ उठावें।


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