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Friday, 28 August 2020

गूगल मीट और जूम के माध्यम से पुरोहित अपने यजमानों की शास्त्रीय, सामाजिक और व्यावहारिक जिज्ञासा शांत करेंगे।

कैलाश सिंह विकास वाराणसी

गूगल मीट और जूम के माध्यम से पुरोहित अपने यजमानों की शास्त्रीय, सामाजिक और व्यावहारिक जिज्ञासा शांत करेंगे। 

पिशाचमोचन नाम से फेसबुक पेज बनाया जा रहा है। इस पेज पर श्राद्ध का महात्म्य, इसके विधान, तिथिवार विवरण के साथ अपलोड उपलब्ध कराया जाएगा। पेज पर पिशाचमोचन से जुड़े पुरोहितों, कर्मकांडी ब्राह्मणों के फोन नंबर भी रहेंगे।

फेसबुक पेज पर दिए हेल्पलाइन नंबर पर संपर्क करने पर नि:शुल्क परामर्श मिलेगा। तीर्थ पुरोहित पं. आलोक भट्ट ने बताया कि श्राद्ध करने वालों की सुविधा के लिए जूम और गूगल मीट के माध्यम से ऑनलाइन श्राद्ध कराने की भी तैयारी की जा रही है। फेसबुक लाइव के माध्यम से लोग प्रतिदिन पुरोहितों के साथ तर्पण भी कर सकते हैं। तीर्थपुरोहित पं. आदित्य शंकर भट्ट ने बताया कि गया में पितृपक्ष मेला स्थगित होने के बाद स्वाभाविक रूप से काशी और प्रयाग में भी पिंडदान नहीं किया जा सकेगा। 

पिशाच मोचन में प्रतिवर्ष देश-विदेश के 18 से 20 लाख लोग गया श्राद्ध के निमित्त आते हैं। विधान के अनुसार उन्हें प्रयाग और काशी में भी श्राद्ध करना होता है। तीर्थपुरोहित पं. जगदीश मिश्र ने स्थानीय लोगों से भी अनुरोध किया है कि कोरोना संक्रमण को ध्यान में रखते हुए वे अपने घरों में ही तर्पण का विधान पूर्ण करें। 

पं. बंडुल दीक्षित ने बताया कि पिशाचमोचन तीर्थ पर अश्वदान की निराली परंपरा है। यह विधान न तो प्रयाग और न ही श्राद्ध भूमि गया में ही है। काशी में भी अश्व दान का स्थान निर्दिष्ट है। श्राद्ध कर्म के दौरान यह दुर्लभ दान है। अश्वदान के बाद व्यक्ति प्रेतकुंड में पिंड डालने का अधिकारी होता है।

देश में केवल यहीं होता है त्रिपिंडी श्राद्ध


भारत में सिर्फ पिशाच मोचन कुंड पर ही त्रिपिंडी श्राद्ध होता है। जो पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु की बाधाओं से मुक्ति दिलाता है। इस कुंड के बारे में गरुड़ पुराण में भी बताया गया है। काशी खंड की मान्यता के अनुसार पिशाच मोचन मोक्ष तीर्थ स्थल की उत्पत्ति गंगा के धरती पर आने से भी पहले से है। पिशाच मोचन कुंड में ये मान्यता है कि हजार साल पुराने इस कुंड किनारे बैठ कर अपने पितरों जिनकी आत्माए असंतुष्ट हैं उनके लिए यहा पितृ पक्ष में आकर कर्म कांडी ब्राम्हण से पूजा करवाने से मृतक को प्रेत योनियों से मुक्ति मिल जाती है।

यहां कुंड के पास एक पीपल का पेड़ है। इसको लेकर मान्यता है कि इस पर अतृप्त आत्माओं को बैठाया जाता है। इसके लिए पेड़ पर सिक्का रखवाया जाता है ताकि पितरों का सभी उधार चुकता हो जाए और पितर सभी बाधाओं से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर सकें और यजमान भी पितृ ऋण से मुक्ति पा सके। प्रेत बधाएं तीन तरीके की होती हैं। इनमें सात्विक, राजस, तामस शामिल हैं। इन तीनों बाधाओं से पितरों को मुक्ति दिलवाने के लिए काला, लाल और सफेद झंडे लगाए जाते हैं। 

इसको भगवान शंकर, ब्रह्म और कृष्ण के ताप्‍तिक रूप में मानकर तर्पण और श्राद का कार्य किया जाता है। प्रधान तीर्थ पुरोहित के अनुसार, पितरों के लिए 15 दिन स्वर्ग का दरवाजा खोल दिया जाता है। यहां के पूजा-पाठ और पिंड दान करने के बाद ही लोग गया के लिए जाते हैं। उन्‍होंने बताया कि जो कुंड वहां है वो अनादि काल से है भूत-प्रेत सभी से मुक्ति मिल जाती है।

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