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Tuesday, 22 September 2020

कृषि बिल कहां तक सार्थक

कृपा शंकर चौधरी ब्यूरो गोरखपुर

       कृषि बिल कहां तक सार्थक


जिस देश की 70% जनसंख्या गांव में रहती हो और जहां GDP का लगभग 20% किसान सम्भालता हो वह देश भारत है। विडंबना देखिए कि अन्नदाता कहें जाने वाले इस किसान के घावों पर मरहम लगाने की जगह सदैव नमक लगाया जाता रहा है। यह अलग बात है की उस समय की सरकारों ने किसानों के विकास के सपने दिखाए किंतु सच्चाई बिल्कुल उल्टा यह है कि किसान शुरू से ही ठगा गया है। दरअसल सरकार के पास ऐसी नीति ही नहीं है या वह बनाना नहीं चाहती की किसान स्वाबलंबी हो सके। जमीन से जुड़े नेता भी जब सरकार में शामिल होते हैं तो उनकी सारी बड़ी-बड़ी बातें खत्म हो जाते हैं जिसे वे चुनाव से पहले कहा करते थे। इसके पीछे राज क्या है समझते हैं।

कृषि प्रधान और सोने की चिड़िया कहलाने वाले भारत को लुटेरों ने सदैव लूटा फर्क बस इतना रहा कभी अपनों ने लूटा तो कभी गैरों ने लूटा। प्राकृतिक संपदा और जनबल वाले भारत में राजतंत्र तक तो गनीमत था किन्तु प्रजातंत्र के नाम पर अंदर ही अंदर पूंजीपति तंत्र ने अपनी जड़ें जमा लिया और निरंतर शोषण जारी है। सबकुछ समझने के लिए इतिहास में जाना होगा।बात 14-15वी शताब्दी की है जब नये देशों की खोज और उपनिवेश बनाने पर कई देशों में प्रतिस्पर्धा चल रही थी और उन देशों द्वारा तमाम कुचक्रो द्वारा कमजोर इमानदार किंतु संपदा से धनी देशों को निशाना बनाया गया जिनमें एक भारत भी रहा। उपनिवेश बनाने वाले इन देशों द्वारा स्थानीय संपदा का भरसक शोषण किया गया और जनता भी शोषण को जीवन का अभिन्न अंग मान बैठी जो आज भी जारी है। समय के साथ आवाज उठी और आने वालों को जाना पड़ा किन्तु उनके द्वारा शोषण का नया तरीका पूंजीवाद छोड़ दिया गया जिसके माध्यम से शोषण अब भी जारी है। 

राजतंत्र में सारे तंत्र राजा के होते थे और वह विप्रो के सामने नतमस्तक रहता था किन्तु अब सरस्वती लक्ष्मी की गुलाम हो गयी है और चारों ओर किसी भी तरह धन संचय करने की होड़ मची है। इसी का कारण है कि देश गरीबी और भ्रष्टाचार के जंजीरों में जकड़ा हुआ है। किसी को इस बात से मतलब नहीं है कि गरीब और असहाय की मदद होनी चाहिए बल्कि मदद कर स्र्वार्थ सिद्धि की जा रही है। आज के समय में अर्थशास्त्र की परिभाषा ही बदल गया है वह धन शास्त्र बन गया है। दरअसल धन शास्त्र में पैसा,सोना आदि है जबकि अर्थ शास्त्र में जमीन आदि रह गया है।

बात हो रही थी सरकार द्वारा किसानों के हित में लाए गए अध्यादेश के बारे में जिसके कारण किसानों के नाम पर संसद से सड़क तक आंदोलन जारी रखने की बात की जा रही है। एक तरफ विपक्ष इसे किसान विरोधी मानता है तो दूसरी ओर सरकार इसे उज्ज्वल भविष्य बताने की कोशिश कर रही है। सच्चाई पर जाएं तो दोनों द्वारा किसानों के नाम पर राजनीति की जा रही हैं और पूंजीवाद शौषण को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि इनके द्वारा औपनिवेशिक शोषण को बचाने की कोशिश की जा रही है। इस प्रकार समझते हैं कि किसान को केन्द्र में रखकर एक के द्वारा पूंजीपति को खुश रखने के लिए केवल हाथ काटने की बात कही जाती है तो दूसरा किडनी और आंख निकालने की बात करता है। कुछ भी कटे कुछ भी निकले नुकसान तो किसानों का होना ही होना है। 

प्रउत प्रणेता और दार्शनिक प्रभात रंजन सरकार का मानना है कि कृषि को सहकारीता के माध्यम से चला कर उच्च शिखर पर पहुंचाया जा सकता है जहां बात अधिकतम खुदरा मूल्य और न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात है तो वह किसानों के मध्य से चुने गए समिति के सदस्यों द्वारा लागत के अनुरूप निर्धारित किया जाएगा। ऐसा होने से पूंजीपति द्वारा कच्चे माल का औना पौना कीमत नहीं लगा पाएंगे। साथ ही विल में पास बात पर गौर करें तो कहा गया है कि पहले से किसानों और पूंजीपति के मध्य हुई बात पर लेन देन होगा तो बताना चाहूंगा कि क्या जोखिम भरे भारतीय कृषि में नुकसान होने पर पूंजीपति के द्वारा बात से पलट जाने पर भारतीय न्यायिक व्यवस्था के तहत किसान पूंजीपति का मुकाबला कर पाएगा। इसके अलावा भारतीय कृषि पर ध्यान दें तो अधिकांश लधु और मध्य किश्म के किसान है जिनका न पहले न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज बिकता था और न अब बिकेगा मतलब शोषण तय है। भविष्य में हारकर किसानों के द्वारा कृषि छोड़ दिया जाएगा और जमीनों को पूंजीपतियों द्वारा अधिकृत कर नयी कम्पनी बना दिया जाएगा और किसान मालिक से बदलकर मजदूर बन जाएगा।

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