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Thursday, 7 January 2021

अंग्रेजों की नीति पर चल रही है सरकारें

अंग्रेजों की नीति पर चल रही है सरकारें
लेखक- कृपा शंकर चौधरी

देश आजाद हुआ किन्तु अपने रक्त बहाने वालों ने कतई नहीं सोचा होगा कि देश की आजादी इस प्रकार की होगी। एक तरफ किसान का पुत्र देश की सीमा पर सुरक्षा के लिए जान की बाजी लगाने के लिए खड़ा है तो दूसरी ओर किसान पिता अपना अस्तित्व बचाने के लिए सरकार के सामने जान देने पर तुला है। स्वतंत्र मीडिया जब सरकार से प्रश्न करती है तो सरकार अपने को किसानों की हितैषी बताती जबकि किसान आंदोलन को राजनीति से प्रेरित बताया जाता है। दूसरी तरफ किसान से पूछने पर सरकार की नीति किसान विरोधी बताया जाता है और सरकार को पूंजीपतियों के हित में काम करना कहा जाता है।

कहावत है कि बिना आग के धुआं नहीं उठता यकीनन यह सत्य है। सरकार द्वारा कृषि और किसानों को लेकर काफी उत्साहित बोल बोले गये जिसे अमलीजामा पहनाने का भी भरसक प्रयास जारी है किन्तु किसानों के मन में सरकार द्वारा लाएं गये बिल में अस्तित्व का संकट दिखाई देता है जिससे बिल का विरोध शुरू हो गया। विपक्ष को भी मौका चाहिए था वह भी किसान के साथ हो लिया। किसानों के मांग का दबाव सरकार पर पड़ने पर सरकार द्वारा सीधा जवाब न देकर आंदोलन को विपक्ष द्वारा प्रेरित करार दिया गया।

राजनीतिकरण से किसानों की जायज मांग अधर में

कृषि क्षेत्र में कार्य कर रही सरकार की कुछ नीतियों से किसानों ने असंतोष जताया और किसानों द्वारा कुछ बिंदुओं पर असहमत होने पर मांग रखी गई। जिसमें न्युनतम समर्थन मूल्य की गारंटी, भंडारण सम्बंधित बिल में बदलाव, कृषि को उद्योग का दर्जा दिया जाना आदि मुख्य हैं। विचारणीय प्रश्न है यदि यह आम मांग जिसके कारण किसानों और कृषि को अग्रगामी बनाती है तो सरकार को मानने में इतना ना-नुकुर करने की आवश्यकता क्यों पड़ी है। विलंब से प्रतीत होता है इस मुद्दे को सरकार अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ रही है या पास बिल से जिस प्रकार का डर किसानों को है उस दिशा में कार्य कर रही है।
जायज आंदोलन का राजनीतिकरण होना, एक दूसरे किसान संगठन को आपस में उलझा देना, आंदोलन को कुचलने का प्रयास करना, भाई को भाई से लड़ा देना यह तो आजादी से पहले अंग्रेजों द्वारा किया जाता था। क्या सरकार अपनी हठधर्मिता के लिए अंग्रेजों के पदचिन्हों पर अग्रसर है?

क्या सहकारिता है समाधान?

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में अनेक धर्म , संप्रदाय, भाषा, बोली का समन्वय है। किन्तु तुच्छ मानसिकता एवं राजनीति के कारण धार्मिक,भाषाई आदि आपसी मनमुटाव खत्म कर एक दिशा में बढ़ने की आवश्यकता है। जितनी भी सरकारे बनी अपने पराए तक उलझ कर रह गई और राजनीति की रोटियां सेंकने हेतु बांटो और राज करो की अंग्रेजी नीति पर चलती रही। वर्तमान समय में आवश्यकता है एक सूत्र में बांधने की इसके लिए जनता को विश्वास में लेकर उचित रणनीति के तहत काम करना सरकार की जिम्मेदारी बनती है और उसे इस दिशा में सार्थक और ठोस कदम उठाने चाहिए।

प्रगतिशील उपयोगी तत्व के प्रणेता एवं दार्शनिक प्रभात रंजन सरकार ने अपने लेखों में जिक्र किया है कि देश और कृषि के विकास के लिए सहकारिता अति आवश्यक है। इससे एक तरफ आपसी सौहार्द तो दूसरी ओर देश विकास की ओर अग्रसर होगा। कृषि नीति पर ही बात करें तो जीविकोपार्जन के लिए सभी लोग एक प्लेटफार्म पर खड़े रहते हैं वहां धर्म,भाषा, संप्रदाय नहीं देखा जाता। एक गांव में विभिन्न जातियां एवं धर्म के लोग निवास करते हैं और सभी जीविकोपार्जन के लिए अलग-अलग संघर्ष करती है। यदि इनके संघर्ष को सहकारिता के माध्यम से इनके हितों को देखते हुए नीतिगत जामा पहनाई जाती है तो विकास की गति को बढ़ाया जा सकता है। सहकारिता के इस कदम से देश के निचले पायदान गांवों का विकास संभव होगा और गांवों के देश भारत में विकास की लहर का श्रृजन होगा।

अलग-अलग सरकारों द्वारा किसानों के हित हेतु नियम लागू किया गया किन्तु वह पूरे देश की जिम्मेदारी संभालने वाले किसानों के लिए मील का पत्थर साबित नहीं हो सका। 

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