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Thursday, 21 January 2021

बढ़ता अपराध और अपराधियों के बुलंद हौसले का कारण एवं निवारण


बढ़ता अपराध और अपराधियों के बुलंद हौसले का कारण एवं निवारण

लेखक- कृपा शंकर चौधरी


किसी परिवार में बेटी हैं तो उसके बाहर जाने पर लोग तब तक चिंतित रहते हैं जब तक वह वापस नहीं आ जाती। मजदूरी और व्यापार से पैसा कमाकर घर आने पर संदेह रहता है कि मैं सकुशल पहुंचूंगा या नहीं। दूसरी ओर मजबूरी में या शौक से अपराध का रास्ता अख्तियार करने वाले नित अपराध का नया रास्ता चुन रहे हैं और अपने काम को बेझिझक अंजाम देते नजर आ रहे हैं। प्रश्न उठता है सरकार प्रशासन और न्याय पालिका द्वारा क्या झूठ में अपनी पीठ थपथपाई जा रही है ? या लोगों को अंधेरे में रख राजनीति के नये नये आयाम स्थापित किए जा रहे हैं। जीरो टॉलरेंस, भ्रष्टाचार रहित सरकार,सबका साथ सबका विकास क्या यह राजनीतिक शगूफा मात्र है। लाखों में बैठे बौद्धिक सम्पदा से चल रही सरकार के उच्च पदस्थ जिम्मेदार अधिकारियों ने क्या सरकार को वास्तविक कारण और निवारण से अवगत नहीं कराया? 
वास्तविकता पर गौर किया जाए तो  हम नि:संदेह कह सकते हैं कि वास्तव में सरकार नहीं चाहती है कि लोग सुरक्षित रहे और देश अपराध मुक्त हो। सरकार बदलती है तो परिवर्तन बस इतना होता है कि अपराधियों की जगह दूसरा अपराधी ले लेता है और यही हाल प्रशासनिक अमले में भी देखा जाता है।  अपराध और भ्रष्टाचार पर गौर करें तो इसके निम्न वजह मुख्य हैं।

 दोगली राजनीति

हर रात के बाद सबेरा होता है इसी उम्मीद के साथ शोषित आम जनता भी नयी सरकार चुनती है कि नई सरकार उनके आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए नीतिगत फैसले लेंगी लेकिन चिकनी चुपड़ी बातों से सरकार बनाने वाली पार्टियां कुर्सी पाते ही   काम की जगह जातिगत,धर्मगत समीकरण तैयार करने लगती है और पूंजीपतियों की रखैल बन उनके हितों में कार्य को अंजाम देती हैं। इससे जिस स्वच्छ राजनीति का सपना गरीब और असहाय के द्वारा देखा गया रहता है वह चूरचूर हो जाता है।

 भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र
 
जिस प्रकार बबूल के पेड़ पर आम नहीं उगते उसी प्रकार अच्छी व्यवस्थापिका न होने से कार्यपालिका भी अपना खेल खेलती है। जिससे लोकतांत्रिक देश में पब्लिक सर्वेंट कहे जाने वाले लोग वास्तव में आमजन का शोषण करते हैं और जनता के चूसे गये  खून की बंदरबांट व्यवस्थापिका में बैठे लोगों तक होती है। इसी बंदरबांट का नतीजा है कि जिम्मेदार इनके उपर अंकुश लगाने में सक्षम नहीं रहते और जनता का शोषण निरंतर जारी रहता है। इसी शोषण का नतीजा होता है कि आमजन के बीच का कोई अपराध का रास्ता अख्तियार कर लेता है और उसके अनुवायी अपराधियों की संख्या बढ़ती जाती है।

 लचर न्यायपालिका

भारतीय कानून में कहा जाता है कि भले ही सौ मुजरिम छूट जाए किन्तु एक बेगुनाह को सजा नहीं होनी चाहिए किन्तु होता उल्टा है।  सौ मुजरिम को सजा भी नहीं हो पाती और एक बेगुनाह को मुजरिम भी सावित कर दिया जाता है। दोष न्यायालय का नहीं बल्कि सिस्टम का है कहा जाए तो उपयुक्त होगा। न्याय मिलने में देरी , उच्च पदों पर एक विशेष वर्ग का अधिपत्य यह सब न्याय पालिका के उपर से लोगों का विश्वास उठने के मुख्य कारण है। इसके अलावा दंड प्रक्रिया के लचर होने से अपराधियों में न्याय पालिका का खौफ नगण्य साबित हो रहा है और अपराध निरंतर बढ़ता जा रहा है। सोचिए क्या एक एकड़ जमीन के किसान की जमीन को जब किसी के द्वारा कब्जा किया जाता है तो वह थाने से लेकर जिला अदालत तक ही जाते जाते टूट जाता है और तिकड़मबाज अपराधी के खिलाफ उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचने की हिम्मत ( आर्थिक दृष्टिकोण से ) नहीं रहती और वह अपनी ही सम्पत्ति गंवा देता है जिससे या तो एक किसान का पतन हो जाता है या एक नये अपराधी का उदय होता है। तर्क में कुछ लोग यह भी कहेंगे कि सरकारी वकीलों की व्यवस्था है तो उन्हें यह भी देखना चाहिए कि इन वकीलों द्वारा कितने केस जीते गए हैं , सब सेटिंग का खेल है।

 पूंजीवादी व्यवस्था

अपराध की जननी पूंजीवाद और पूंजीवादी व्यवस्था है कहा जाए तो यह अतिश्योक्ति नहीं होगी। क्योंकि अधिकांश सभी अपराध का मुख्य संबंध धन से होता है और धन को अर्जित करने के लिए नेता, पूंजीपति, अपराधी , अधिकारी द्वारा सभी निरीह जनता का आर्थिक, समाजिक, बौद्धिक शोषण किया जाता है। इससे अपराध और अपराधी दोनों की वृद्धि होती है।

 निराकरण

एक स्वच्छ समाज और देश को बनाने के लिए समाज के निचले पायदान से उपर तक अच्छे व्यक्तित्व के लोगों को जगह देने की आवश्यकता है । इनके चयन प्रक्रिया के लिए समाजिक मानदंड अपनाने की जरूरत होनी चाहिए। किताबी ज्ञान के अलावा सभ्य समाजिक होना भी मानदंड का भाग होना चाहिए। चयन प्रक्रिया वातानुकूलित कमरे में बैठने वाले सिर्फ न करें बल्कि लोकल लोगों की कमेटी से भी उस व्यक्ति को पास होना जरूरी होना चाहिए। इस प्रकार से होने से भ्रष्ट और निकम्मेपन लोगों के प्रवेश पर अंकुश लगाया जा सकता है। इस तरह के लोग जब जिम्मेदार पदों पर आसीन होंगे तो शोषण में कमी आएगी। इसके अलावा नेताओं के लिए भी मानदंड की आवश्यकता है ताकि नेतागिरी समाजसेवा हो न कि आर्थिकोपार्जन का साधन। संविधान में भी कुछ हिस्सों में संशोधन के अलावा पूंजीवादी व्यवस्था पर कठोर कानून बनाने की आवश्यकता है।

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