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Monday, 19 October 2026

पूंजीवाद का भविष्य और उसके बाद: राख के ढेर से प्रउत (PROUT) के नव-निर्माण तक

लेखक-  कृपा शंकर 

आज संपूर्ण विश्व एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ एक ओर तो विज्ञान और तकनीक की चकाचौंध है, परंतु दूसरी ओर करोड़ों-अरबों मनुष्यों के जीवन में घोर आर्थिक असुरक्षा, बेरोजगारी और अभाव का अंधकार छाया हुआ है। यदि हम वर्तमान वैश्विक संकट की जड़ में जाकर देखें, तो इसके पीछे सबसे बड़ी बाधा और सबसे क्रूर शक्ति 'पूंजीवादी अर्थव्यवस्था' (Capitalism) ही दिखाई देती है। आज यह प्रश्न केवल अर्थशास्त्रियों का नहीं, बल्कि प्रत्येक संवेदनशील मानव की अंतरात्मा का प्रश्न है कि—इस शोषणकारी पूंजीवाद का भविष्य क्या है और इसके ढहने के बाद मानव सभ्यता किस मार्ग पर चलेगी?

(1) पूंजीवाद की राक्षसी भूख और मानवता का शोषण
पूंजीवाद का मूल मंत्र ही है—'अधिकतम मुनाफा और संपत्ति का असीमित केंद्रीकरण'। इस व्यवस्था में मनुष्य को एक जीवित, संवेदनशील प्राणी या परम पुरुष की संतान के रूप में नहीं, बल्कि केवल 'मुनाफा कमाने वाले एक यंत्र' या 'उपभोक्ता' के रूप में देखा जाता है। 

आज यदि दुनिया में कोई व्यक्ति भूखा है, चिथड़ों में लिपटा है या बिना इलाज के दम तोड़ रहा है, तो वह प्रकृति की कमी के कारण नहीं, बल्कि पूंजीवाद के समर्थकों की असीमित और राक्षसी भूख के कारण है। मुट्ठी भर पूंजीपतियों ने संपूर्ण विश्व के संसाधनों पर कुंडली मार ली है, जिससे अमीरी और गरीबी के बीच की खाई पाताल से भी गहरी हो चुकी है। स्वार्थ और अविद्या माया में अंधे होकर मानवता का रक्त चूसने वाली यह मानसिकता वास्तव में इस सृष्टि के प्रति एक अपराध है।

(2) क्रय-शक्ति का विनाश और आर्थिक दिवालियेपन का जीवंत प्रमाण
महान दार्शनिक और प्रउत (PROUT) के प्रणेता श्री श्री आनंदमूर्ति जी ने स्पष्ट कहा है कि किसी भी देश या समाज की वास्तविक समृद्धि का पैमाना वहाँ के मुट्ठी भर अरबपतियों की संपत्ति नहीं, बल्कि आम नागरिक की 'क्रय शक्ति' (Purchasing Capacity) होती है। 

आज भारत की वर्तमान आर्थिक स्थिति को देखें, तो पूंजीवादी नीतियों के खोखलेपन का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि आजादी के इतने दशकों बाद भी देश की लगभग 80 करोड़ जनता अपने जीवन-यापन के लिए सरकार द्वारा दिए जाने वाले '5 किलो मुफ्त अनाज' पर निर्भर है! विडंबना देखिए कि बिहार जैसे राज्य के शीर्ष सत्ताधारी राजनेता जब मंचों से गर्व के साथ यह घोषणा करते हैं कि "बिहार की 14 करोड़ की आबादी में से 10 करोड़ लोगों को केंद्र सरकार मुफ्त भोजन दे रही है", तो वे अनजाने में अपनी उपलब्धि नहीं, बल्कि इस पूंजीवादी व्यवस्था के आर्थिक दिवालियेपन की ही पुष्टि कर रहे होते हैं।

एक विचारशील मनुष्य के लिए यह अत्यंत पीड़ादायक प्रश्न है कि आखिर देश के 80 करोड़ और बिहार के 10 करोड़ लोगों को इस स्थिति में किसने पहुँचाया जहाँ वे अपने श्रम से अपने परिवार के लिए दो वक्त का अनाज भी खरीदने में असमर्थ हैं? यह मुफ्त अनाज कोई 'विकास' नहीं है, बल्कि पूंजीवाद द्वारा आम जनता की क्रय-शक्ति (Purchasing Power) को पूरी तरह निचोड़ लेने के बाद दिया जाने वाला एक 'जीवन-रक्षक भत्ता' मात्र है। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि हम आर्थिक रूप से कितनी तेजी से दिवालियेपन की ओर बढ़ रहे हैं।

(3) पूंजीवाद का भविष्य: पटाखे की तरह विस्फोट निश्चित है
श्री श्री आनंदमूर्ति जी ने दशकों पूर्व यह भविष्यवाणी की थी कि जिस प्रकार साम्यवाद (Communism) मानवीय मनोविज्ञान की उपेक्षा करने के कारण अकाल मृत्यु को प्राप्त हुआ, ठीक उसी प्रकार पूंजीवाद अपने ही आंतरिक विरोधाभासों और कलह के कारण एक दिन पटाखे (Cracker) की तरह फट जाएगा।

इसका अर्थशास्त्र अत्यंत सीधा है:
• जब देश की 70-80 प्रतिशत आबादी केवल 5 किलो अनाज के सहारे जीवित रहेगी और उसकी जेब में क्रय-शक्ति (पैसा) ही नहीं होगी, तो पूंजीपतियों के बड़े-बड़े कारखानों में बना माल खरीदेगा कौन?
• सारा धन कुछ गिने-चुने उद्योगपतियों की तिजोरी में बंद हो जाने से बाजार में मांग (Demand) समाप्त हो जाएगी।
• परिणामस्वरूप उत्पादन ठप होगा, बैंक डूबेंगे, भयंकर आर्थिक महामंदी आएगी और मुनाफे का यह विशाल गुब्बारा अपने ही आंतरिक दबाव से फट जाएगा।

(4) पूंजीवाद के बाद क्या? (आदर्शवाद और भौतिकवाद का समन्वय)
अब तक मानव समाज ने दो ही चरमपंथ देखे हैं—एक ओर कोरा आदर्शवाद, जिसने भूखे इंसान की पेट की आग को अनदेखा करके केवल रहस्यमयी मोक्ष की बातें कीं; और दूसरी ओर जड़ भौतिकवाद, जिसने मनुष्य की आत्मा और नैतिकता को कुचल दिया। 

श्री श्री आनंदमूर्ति जी ने जब धर्म संस्थापना और समाज के कल्याण का चिंतन किया, तो उन्होंने पाया कि "भूखे, चिथड़ों में लिपटे और अभावग्रस्त लोगों को दर्शन नहीं सिखाया जा सकता; वे बेचारे खाली पेट कैसे साधना करेंगे?" इसी करुणा और यथार्थ के धरातल पर उन्होंने भौतिक और आध्यात्मिक जगत के बीच एक सुंदर सेतु (Happy Blending) का निर्माण किया, जिसका नाम है—प्रउत (PROUT - प्रगतिशील उपयोगतत्त्व)।

(5) राख के ढेर पर खड़ी होगी 'प्रउत' की नई इमारत
जब यह शोषणकारी पूंजीवाद अपने ही पापों से ध्वस्त होगा, तो उसी के राख के ढेर पर प्रउत की एक नई और शोषण-मुक्त इमारत खड़ी होगी। प्रउत के मुख्य स्तंभ इस प्रकार हैं:

1. भीख नहीं, क्रय-शक्ति और पांच न्यूनतम आवश्यकताओं की संवैधानिक गारंटी: प्रउत का लक्ष्य जनता को 5 किलो अनाज का भिखारी बनाना नहीं है। विश्व के इतिहास में पहली बार श्री श्री आनंदमूर्ति जी ने यह वकालत की कि प्रत्येक मनुष्य की पांच न्यूनतम आवश्यकताओं—भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और चिकित्सा—को संविधान में 'मौलिक अधिकार' (Fundamental Right) के रूप में दर्ज किया जाए, और इसकी पूर्ति प्रत्येक नागरिक को शत-प्रतिशत रोजगार तथा क्रय-शक्ति (Purchasing Capacity) देकर स्वाभिमान के साथ की जाए।

2. विविधता का सम्मान (Minimum Requirements and Maximum Amenities): प्रउत जहाँ हर मनुष्य की न्यूनतम आवश्यकताओं की समान रूप से पूर्ति करता है, वहीं समाज के लिए विशेष योगदान देने वाले गुणी, चिकित्सक, वैज्ञानिक और श्रमशील व्यक्तियों को अतिरिक्त सुविधाएं (Amenities) देकर उनकी प्रतिभा का सम्मान भी करता है। साथ ही, न्यूनतम और अधिकतम आय के बीच के अंतर को सीमित रखता है ताकि फिर कभी कोई शोषक वर्ग पैदा न हो सके।

3. संपत्ति के संचय पर अंकुश और सहकारिता: समाज की अनुमति के बिना किसी भी व्यक्ति को असीमित भौतिक संपत्ति जमा करने की छूट नहीं होगी। कृषि और उद्योगों का संचालन पूंजीपतियों के बजाय 'सहकारिता' (Cooperative System) और विकेंद्रीकृत अर्थव्यवस्था के माध्यम से स्थानीय लोगों द्वारा किया जाएगा।

4. नव्य-मानवतावाद और नैतिक नेतृत्व (सद्विप्र समाज): प्रउत की व्यवस्था स्वार्थी राजनेताओं या पूंजीपतियों के दलालों के हाथ में नहीं, बल्कि नैतिक, आध्यात्मिक और चरित्रवान नेतृत्व (सद्विप्रों) के हाथ में होगी, जो 'शिव भावे जीव सेवा' के मंत्र को लेकर संपूर्ण सृष्टि के अस्तित्व की रक्षा करेंगे।

उपसंहार:
आज जिन लोगों को शोषण-मुक्त समाज का यह चित्र असंभव (Utopia) लगता है, वे यह भूल जाते हैं कि सृष्टि का संचालन किसी पूंजीपति की तिजोरी से नहीं, बल्कि परम पुरुष की इच्छा और प्रकृति के अटल नियमों से होता है। जहाँ करोड़ों लोग 5 किलो अनाज के मोहताज हों और कुछ मुट्ठी भर लोग देश की सारी संपत्ति के मालिक बन बैठे हों, वह व्यवस्था अधिक दिनों तक नहीं टिक सकती। 

पूंजीवाद का अंत अब केवल समय की बात है। इसके पतन के पश्चात मानव जाति के पास भौतिक उन्नति और आध्यात्मिक शांति के समन्वय—अर्थात् 'प्रउत' और 'नव्य-मानवतावाद'—को अपनाने के अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग शेष नहीं रहेगा। यही आने वाले स्वर्णिम भविष्य की पुकार है और यही पीड़ित मानवता का एकमात्र उद्धार है।


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