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Wednesday, 10 October 2018

कानपुर-- कभी राजा कर्ण इस मंदिर में करते थे पूजा जानिए क्या है मन्दिर का इतिहास

ब्यूरो कानपुर -रवि गुप्ता

कानपुर-- शारदीय नवरात्र का आज पहला दिन है और शहर के तमाम देवी मंदिरों में श्रद्धालुओं  की भीड़ देररात से ही माता के दर्शन के लिए पहुंचने लगी है और सुबह चार बजे जैसे ही दरबार के पट खुले तो माता के जयघोष से मंदिर गूंज उठा। शहर के बीचोबीच स्थित माता तपेश्वरी का यह मंदिर का इतिहास त्रेता युग का बताया जाता है। साथ ही मान्यता है की यह मंदिर में राजा कर्ण भी देवी के दर्शन के लिए आते थे। बताया जाता है कि राजा कर्ण की राजधानी कर्णपुर थी जो बाद में कानपुर के नाम से जानी जाने लगी। वहीं लोगों का कहना है कि राजा कर्ण माता रानी के दर्शन के लिए यहां आते थे उस समय यहां बेरों पेड़ो का जंगल हुआ करता था जिसके बाद इस जगह का नाम बदलकर बिरहाना रोड पड़ गया ।
 


 
बिरहाना रोड पर बना यह प्राचीन मंदिर रामायणकाल से जुड़ाहै जिसका नाम  तपेश्वरी देवी  है यहाँ वैसे तो आमदिनों में भी भक्तो की भीड़ रहती है लेकिन नवरात्र के पर्व पर यहाँ श्रद्धालुओ का तांता लग जाता है। तपेश्वरी देवी मंदिर में नवरात्र के पहले दिन सुबह 4 बजे से ही माता के दर्शनों के लिए पट खोल दिए गए। 
 
 
 
जहां पुलिस प्रशासन की भारी सुरक्षा के बीच पुरुष और महिलाओ के लिए बेरिकेटिंग कर अपनी अपनी लाइनों में खड़े होकर माता के दर्शन पाए। मंदिर में भक्तो का हुजूम देखते ही बनता है यहां भक्त चुनरी बांधकर मन्नत भी मांगते है और ज्योति जलाते है।मंदिर में सुरक्षा के मद्दे नजर प्रशासन पूरी तरह अलर्ट दिखाई दे रहा था वही प्रशासन दवारा मंदिर परिषर के चारो तरफ सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए है। वही महिलाओ के साथ छेड़खानी रोकने के लिए सदी वर्दी में यहां पर लेडी पुलिस भी लगाई गई है। 

क्या कहना है मंदिर के पुजारी का

मन्दिर के पुजारी राम लखन तिवारी ने बताया कि मंदिर का इतिहास त्रेतायुग का है भगवान्  राम  ने सीता माता को त्याग किया था जिसके बाद  लक्ष्मण जी मां सीता को यहां छोड़ गए थे तब यहां घना जंगल हुआ करता था जिसके बाद सीता माता यहां से बिठुर चली गयी लेकिन हर दिन बिठूर से
पैदल ही यहां आकर तप करती थी।  
 
 
जिसके बाद यहां पर देवियां उतपन्न हुई और तब से इस मंदिर का नाम तपेश्वरी देवी के नाम से प्रसिद्ध हो गयी उन्होंने यह भी बताया की यहां राजा कर्ण भी इस मंदिर में दर्शन के लिए आया करते थे। कानपुर का पहले नाम कर्णपुर हुआ करता था। और यह राजा कर्ण की राजधानी थी। लेकिन बाद में कर्णपुर से इसका नाम कानपुर हो गया। 
 
वही मंदिर की एक और यह भी मान्यता है की ,माता सीता ने अपने दोनों पुत्रो लव कुश का मुंडन भी इसी स्थान पर कराया था हुआ था जिसके बाद अब लोग यहां पर अपने बच्चो का मुंडन और कर्णछेदन भी यही कराते है।इस मंदिर में शहर ही नही बल्कि पूरे देश से श्रद्धालु माता के दर्शनों के लिए नवरात्रि में पहुंचते है.वही पूरे नव दिन मंदिर में मेले कला भी आयोजन किया जाता है।

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