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Sunday, 18 August 2019

अंग्रेज भी मानते थे इस राजा का लोहा, आज भी लोगों की जुबां पर है उनकी शहादत के किस्से


जिला सवांदाता:अरविन्द शर्मा 

अंग्रेज भी मानते थे इस राजा का लोहा, आज भी लोगों की जुबां पर है उनकी शहादत के किस्से


कानपुर देहात-1857 के ग़दर में देश के कोने कोने से आज़ादी की चिंगारी भड़क उठी थी। कई राजाओं ने भी अपनी रियासतों का भोग विलास छोड़कर देश को फिरंगियों के चंगुल से मुक्त कराने की ठान ली थी। ऐसे ही गौर राजा दरियावचंद्र का किस्सा कानपुर देहात में गूंजता है। लोग आज भी राष्ट्रीय पर्वों पर उनके बहादुरी के किस्से सुनाया करते हैं। रसूलाबाद क्षेत्र के नार कालिंजर के राजा दरियावचंद्र का ध्वस्त हुए किले के अवशेष आज भी उनकी शहादत की याद दिलाते हैं। रसूलाबाद कोतवाली, धर्मगढ़ मंदिर व मजार का ये वही हिस्सा है, जो कभी राजा की रियासत हुआ करती थी। आज वहां लाल पत्थर की हवेली एक खेड़े का रूप ले चुकी है। उस वीराने में आज धार्मिक आयोजनों के साथ मेले लगा करते हैं।

फिरंगियों के अत्याचार ने उन्हें झकझोर दिया


आज़ादी की जंग छिड़ चुकी थी। चारो तरफ हाहाकार मचा हुआ था। भारत माँ को गुलामी की जंजीर से आज़ाद कराने के लिए लोग घरों से निकल चुके थे। इधर अंग्रेजों के अत्याचार से लोग कराह रहे थे। नार से गुजरी रिन्द नदी के पुल से गुजरने वाले फिरंगियों के घोड़ों के टापों की आवाज़ दरियावचन्द्र को परेशान किया करती थी। जिसको लेकर उनके मन मे क्रांति की ज्वाला भड़क रही थी। जो 1857 के संग्राम मे फूट गयी। चारों तरफ आज़ादी का हुजूम दौड़ने लगा। क्रांतिकारी मैदान मे आ चुके थे, लेकिन अंग्रेजो की सरफरस्ती के चलते लोगो के पास हथियार जुटाने के लिये धन नही था। तब गौर राजा दरियावचंद्र की अगुवाई मे आज़ादी के संग्राम मे कूद चुके तमाम रियासतदारों और क्रांतिकारियों ने अंग्रेजो के खजाने को लूट लिया और चढाई करके अंग्रेजो को गंगा पार खदेड दिया।

फिर अंग्रेजों ने राजा को फांसी पर लटका दिया

विद्रोह के थमने पर अंग्रेजी हुकूमत के गुलामो ने राजा दरियावचंद्र को गिरफ्तार कर लिया और धर्मगढ परिसर मे खडे नीम के पेड़ से लटका दिया। जिसके बाद अंग्रेजों ने उनकी रियासत को जब्त करके खानपुर डिलबल के पहलवान सिंह को सौंप दी थी। जो आज भी राजा दरियावचन्द्र की कुर्बानी का किस्सा ये पुराना किला बयां करता है। नार कहिंझरी के लोगो का कहना है, कि राजा दरियावचंद्र की वर्तमान पीढी से कोई भी अब यहाँ नही रहते है। लेकिन राजा के बलिदान की कहानी जरूर यहां सुनाई जाती है। राजा के पारिवारिक लोग रसूलाबाद के दहेली गांव में निवास करते हैं जिनके पास आज भी उनकी यादें ही महज शेष रह गयी हैं। नार में उनके किले की दो दीवारों के साथ किले का जर्जर दरवाजा उनकी शहादत की याद दिलाता है।

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