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Saturday, 9 May 2020

महामंदी, उग्र राष्ट्रीयता और प्रउत



लेखक राजेश सिंह
सदस्य, प्रउत ग्लोबल

     महामंदी, उग्र राष्ट्रीयता और प्रउत

29 अक्टूबर, 1929 को अमेरिका के शेयर बाजार के औंधे मुंह गिरते ही दुनिया दस साल तक चलने वाली महामंदी की गिरफ्त में आ गयी। जब मंदी की शुरुआत हुई तो अमेरिका में बेरोजगार लोगों की संख्या पंद्रह लाख थी जो देखते ही देखते तकरीबन दस गुनी बढ़कर एक करोड़ तीस लाख के पार जा पहुंची। करोड़ो लोगों की नौकरियां गयीं, लाखों की आर्थिक हालत बहुत खराब हो गयी, जिससे परेशान हजारो लोगों ने आत्महत्या कर ली।

आर्थिक समस्याओं का समाधान किसी देश के पास नहीं था, अतः सभी राष्ट्रों ने राष्ट्रीयता की भावना को भड़काना शुरू किया, जिसकी परिणति जर्मनी में हिटलर और इटली में मुसोलिनी जैसे फासीवादी ताकतों के आधिपत्य जमाने के रूप में हुई और अंततः दुनिया को दूसरे विश्व युद्ध में झोंक दिया गया।

आज भी आर्थिक समस्यायें चरम पर हैं। अमेरिका अपने यहां हुए 2.6 करोड़ लोगों की बेरोजगारी से त्रस्त, सभी प्रवासी कामगारों को निकालने की तैयारी में है। भारत में अबतक 14 करोड़ लोगों की नौकरियां जा चुकी हैं। आर्थिक समस्याओं का किसी के पास कोई समाधान नहीं है इसलिये सरकार ने, कोरोना वायरस के तमाम खतरे को धता बताते हुये, एक तरफ शराब बेचने  की मंजूरी दे दी है तो दूसरी तरफ, धीरे धीरे, राष्ट्रीयता की भावना को भी भड़काया जायेगा।

प्रबुद्ध जनमानस के साथ दिक्कत यह है कि वह स्वयं आर्थिक रूप से अच्छी स्थिति में होते हैं, तो उन्हें कहीं कोई परेशानी नज़र नहीं आती है। ठीक वैसे ही, जैसे 11 सितम्बर, 2001 को जबतक आतंकवादियों ने अमेरिका का वर्ल्ड ट्रेड सेंटर धराशायी नहीं कर दिया, तबतक अमेरिका को भी आतंकवाद की परिभाषा समझ आती नहीं थी।

आज मंदी, बेरोजगारी, गरीबी आहिस्ता आहिस्ता हमारी तरफ बढ़ रही है, और इन समस्याओं के जनक पूंजीवाद के पास इसका कोई इलाज है नहीं। अन्तोगत्वा, दुनिया को थक हारकर श्री प्रभात रंजन सरकार द्वारा प्रतिपादित प्रगतिशील उपयोग तत्त्व (प्रउत) के शरण में जाने के अतिरिक्त कोई विकल्प शेष बचा नहीं है।

यह बिल्कुल सामयिक है कि प्रउत के कार्यकर्ता, प्रउत के आर्थिक लोकतंत्र और विकेन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था को जनमानस के साथ साथ नीति निर्देशकों तक भी लेकर जायें। सरकार द्वारा सिर्फ कह देने भर से, कि गाँव को स्वालम्बी बनाया जाय, काम पूरा नहीं हो जाता। सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह गांव से लेकर राज्य और राष्ट्र को स्वालम्बी और सशक्त बनाने के लिये प्रउत सिद्धांत के आधार पर नितियाँ और कार्ययोजना बनाये और बड़ी ही दक्षता के साथ उनका किर्यान्वन किया जाय। एक एक व्यक्ति जब समृद्ध होगा तो राष्ट्र खुद ब खुद ही समृद्ध और सशक्त होता जायेगा।

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