Thursday, 6 May 2021
भारत दुर्दशा: नीम हाकिम खतरा ए जान
भारत दुर्दशा: नीम हाकिम खतरा ए जान
प्रोफेसर आर पी सिंह
वाणिज्य विभाग
गोरखपुर विश्वविद्यालय
E-mail: rp_singh20@rediffmail.com
Contact : 9935541965
हड़प्पा युग से ही यह ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित है कि जब भी मूर्ति पूजा, बहुदेववाद, अवतारवाद, जाति या नस्लीय भेद, विभाजन और भेदभाव समाज में प्रचलित होता है तो समाज एक ईश्वर केंद्रित शक्तियों आगे बहुत कमजोर पड़ जाता है । यह व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है कि हड़प्पा, मोहेंजो-दारो और सिनौली की सभ्यताओं में समाज में मूर्ति पूजा और बहुदेववाद मौजूद थे। आर्यों के आरोहण के साथ इन सभ्यताओं ने अपना अस्तित्व खो दिया। दक्षिण की ओर भी वे हावी रहे । अपने प्रभुत्व के दौरान आर्यों को एकल भगवान केंद्रित दृष्टिकोण में दृढ़ विश्वास था और मूर्ति पूजा के विरोधी थे। तब वैदिक युग में वेदों का प्रबल प्रभाव पड़ा लेकिन वेदों का एकाधिकार नहीं था।
पर बाद में, आर्य कर्मकांड, हठधर्मिता, अहंकार और आत्म-मुग्धताकी ओर उन्मुख हो गए जिसके खिलाफ भगवान बुद्ध ने चौथे ईसा पूर्व (2400 साल पहले) में विद्रोह किया था। उस काल में वर्ण व्यवस्था भी जन्म आधारित जातिगत भेदभाव की ओर उन्मुख थी । आगे चलकर बौद्ध धर्म भी मूर्ति पूजा, बहुदेववाद, अवतारवाद (बुद्ध के अवतार) के साथ पतन का शिकार हुआ । यह इसवी सन ३१९ से ४६७ (लगभग १६५० साल पहले) के दौरान आरोही गुप्तकाल मैं पौराणिकों से संघर्ष में भारत से लगभग बाहर ही हो गया । बाद में पौराणिकधर्म (सनातन धर्म या हिंदू धर्म के रूप में आगे प्रचलित) ने भी मूर्ति पूजा, बहुदेववाद और अवतारवाद को बौद्ध धर्म की प्रतिस्पर्धा में अधिक आक्रामक रूप से पाला। बाद में गुप्तकाल के पराभव के दौरान जाति विभाजन के स्थायित्व के साथ सामाजिक ताना-बाना कमजोर हो गया और यह शुरू में यूनानियों, शकों और हूणों से बाहरी गड़बड़ी और आंतरिक साजिश का सामना करने में असमर्थ हो गया और अंत में एक अल्लाह उन्मुख मुस्लिम और तुर्की हमलावरों (7 से 11 वीं इसवी) से।
मध्ययुगीन काल के दौरान भारत में शासक, मुस्लिम या गैर-मुस्लिम, दोनों ने ही किसी भी एकीकृत, अनुशासित, ईश्वर केंद्रित कल्याणकारी बल विकसित करने के बजाय अपनी राजशाही शक्ति को बढ़ाने के लिए जनता के बीच संप्रदाय, जाति, भाषा या क्षेत्रीय मतभेदों को भुनाने में अधिक रुचि रखते रहे । कबीर, नानक, रविदास, चैतन्य आदि भक्तिकालीन संतों के उपदेश पर सत्तासीनों ने प्रायः ध्यान नहीं दिया। सामाजिक ताना-बाना कमजोर हो गया और एक ईश्वर केंद्रित अनुशासित ईसाई ताकतों ने भारत पर कब्जा कर लिया। स्वतन्त्रता के बाद भी इन ताकतों को कम से कम शिक्षा और स्वास्थ्य में तरजीह दी जाती रही है।
ब्रिटिश शासन के दौरान और उसके बाद कुछ तथाकथित राष्ट्रवादी विद्वानों ने 'जाति' को भारतीय समाज का एक महत्वपूर्ण तत्व माना। उनकी धारणा रही है कि हमारे यहाँ जातियां रही हैं, लेकिन हमने एक जाति और दूसरे के बीच संघर्ष को कभी भी मौलिक अवधारणा के रूप में स्वीकार नहीं किया। इस तरह का दृष्टिकोण उन पाखंडियों का अत्यधिक भ्रमकारी है जो एक तरफ मानवता की बात करते हैं और दूसरी ओर जाति को स्थायी-व्यस्था, जीवनी शक्ति और अंतर्निहित भेदवादिता को मान्यता देते हैं । जाति है तो देर-सबेरजातिभेद होना ही है, जातीय संघर्ष भी और क्षतिपूरक उपाय के तौर पर आरक्षण से बच नहीं सकते। फासीवादी तर्ज पर इस तरह की सोच और इसपर विरोधियों द्वारा जवाबी विचारों ने सामाजिक ढांचे को और कमजोर करने तथा विभाजनकारी माहौल बनाने में योगदान किया है ।
आर्यों के उत्कर्ष पर वापस आते हैं । वेद स्पष्ट घोषणा करते हैं: न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यस: --इसकी कोई प्रतिमा नहीं है। (यजुर्वेद अध्याय 32, मंत्र 3) । सभी महान विद्वान: आदि शंकराचार्य, आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) महर्षि दयानंद को और आगे श्री आनंदमूर्ति ने इस बुराई से क्षति को देखते हुए इसका सत्य आम जन को बताया । चारों वेदों के 20589 मंत्रों में कोई ऐसा मंत्र नहीं है जो मूर्ति पूजा (idol worship) का पक्षधर हो । ( यजुर्वेद अध्याय 32 , मंत्र 3 ) अवतारवाद और जाति-व्यवस्था को भी वैदिक वाङ्ग्मय में कहीं समर्थन नहीं है।
यह एक हद तक सही है जब स्वामी विवेकानंद सीमित मूर्ति पूजा का समर्थन करते हैं, जब वह उल्लेख करते हैं कि मूर्ति पूजा प्राथमिक आकांक्षी के लिए एक आवश्यकता है, हालांकि यह उच्च स्तर पर साधकों के लिए आवश्यक नहीं । आप अध्यात्म के अपने रास्ते पर उन्नत है इसका मतलब यह नहीं है कि आप अपनी बूढ़ी मां या दादी को उनकी मूर्ति पूजा के लिए रोकें। यह बस ऐसा ही है: किसी को मास्टर या पीएच डी की उपाधि मिल गयी है तो उसे प्राथमिक शिक्षा की आवश्यकता को नकारने का अधिकार नहीं है । लेकिन इस नज़रिये के दूसरे पक्ष के ज्यादा गंभीर निहितार्थ हैं । वास्तविकता में वोट की राजनीति में इस नज़रिये का घोर दुरुपयोग हुआ है। वोट की राजनीति का रुख यह रहा है कि सभी या कम से ज्यादातर लोगों को आध्यात्मिक और नैतिक विकास के निम्नतम स्तर पर रहने दें क्योंकि यह सभी प्रकार की रूढ़िवादिता और संकीर्ण भावनाओं को बढ़ावा देकर वोट बैंक बनाए रखने और पूंजीपतियों से धनदोहन में मददगार है। मूर्ति पूजा, बहुदेववाद, अवतारवाद, जाति या नस्लीय भेद, विभाजन और भेदभाव को बढ़ावा देना राजसत्ता के लिए भले ही मददगार है, लेकिन बिखराव उत्पन्न कर यह संरचना को काफी कमजोर बना देता है जैसा कि उपरोक्त विवरणों से स्पष्ट है । इसलिए, ऐसी संकीर्णताओं का समर्थन करना ठीक नहीं।
सभ्यताओं का टकराव
दुनिया लंबे समय से कुछ प्रमुख धर्ममतों के अनन्य सांप्रदायिक मंसूबों का सामना कर रही है । इनमें से हर कोई दावा करता है कि वह सिर्फ एक पंथ या मत नहीं है बल्कि पूरी दुनिया के अपनाने लिए मात्र यही एक योग्य जीवन पद्धतिहै । बाकी अन्य अपूर्ण, दोषपूर्ण और अस्वीकृति के लायक हैं । लेकिन इन धर्ममतों में से कोई भी युक्तितर्क के लिए खुला नहीं है । इनका दृष्टिकोण रहा है: मज़हब में अकल का दखल नहीं। वे एक-दूसरे को दिल से बर्दाश्त नहीं करते--धार्मिक व अंतरधार्मिक जातीय आतंकवाद का मूल कारण । यदि ये धार्मिक धाराएँ सांस्कृतिक सम्मिश्रण और अनुभव व ज्ञान के आदान-प्रदान और विकास की दिशा में उन्मुख होतीं, तो कोई समस्या नहीं, कोई मुद्दा नहीं । लेकिन इन धार्मिक मान्यताओं के मूल में, कुछ समस्या रही है कि इन विभिन्न धार्मिक मान्यताओं में से प्रत्येक अपनी श्रेष्ठता और पूर्णता के अहंकार में खुद के अलावा किसी और के अस्तित्व को स्वीकार करने में सक्षम नहीं हैं, और कट्टरपंथियों, अतिवादियों और पुरातनवादियों के समर्थन से सभ्यताओं के बीच संघर्ष और टकराव बढ़ते रहे हैं ।
धर्ममतों को इस इरादे से स्वीकार किया गया है कि वे विविधता, रुचि और बहुलता प्रदान करते हैं । लेकिन यह देखा गया है कि उन्होंने सदियों से पूरी दुनिया में नस्लीय और जातिगत भेदभाव के प्रोत्साहन के अलावा विविधता, रुचि और बहुलता से ज्यादा रक्तपात और विनाश लीला की है ।
इसलिए, जाति, नस्ल और संप्रदायों के कृत्रिम विभाजन के स्थान पर विविधता और बहुलवाद को बनाए रखने के लिए प्राकृतिक और भू-सांस्कृतिक मतभेदों को महत्व, मान्यता और गरिमा प्रदान करना उचित है; जबकि धार्मिक पहचान को अनिवार्यतः पारिस्थितिक-सांस्कृतिक पहचान में विलय करके समाप्त करने की जरूरत है । प्रउत का समाज आंदोलन कृत्रिम और जन्मजात थोपे गए पहचान को ढोने के बजाय इन पारिस्थितिक और भू-सांस्कृतिक पहचान को महत्व, समर्थन और मान्यता देने पर केंद्रित है । प्रउत ने पृथ्वी पर 256 समाजों/ पारिस्थितिकी-सांस्कृतिक क्षेत्रों और भारत में 44 समाजों/ पारिस्थितिकी-सांस्कृतिक क्षेत्रों का प्रस्ताव रखा है।
Covid-21 के प्रभाव और सबक
आज के शासन-प्रशासन राष्ट्रवाद, देशभक्ति और सनातन धर्म के नाम पर मूर्तिपूजक, बहुदेववाद, अवतारवाद, जाति भेद, वर्चस्व, विभाजन और भेदभाव को समर्थन देकर उन्हीं ऐतिहासि महा भूलों को फिर से दोहरा रहे हैं जो हमेशा से राष्ट्र को कमजोर करते रहे हैं । आस्था के नाम पर अंधविश्वास, कट्टरवाद और रूढ़ियों का महिमामंडन करने की प्रवृत्ति आत्म-घाती है। भारत में कोविड-19 की दूसरी लहर को संभालने की विफलता में इसके दुष्परिणाम स्पष्ट हैं । पहली लहर के दौरान भूलों से मिली सीखों के आधार पर आगे आसन्न संकट से निपटने की तैयारी करने के बजाय अति आत्मविश्वासी और अंधविश्वासी शासन-व्यवस्था भीड़ वाली चुनावी सभाएं, चुनाव, मंदिर निर्माण, कुंभ आदि आयोजित करने में लिप्त रहा है ।
कोविड की इस दूसरी लहर में भारत भले ही अजीब स्थिति में फंसा है, पर दुनिया के तमाम देशों ने जिस तरह भारत की सहायता के लिए हाथ बढ़ाया है वह भारत के 'वसुधइव कुटुंबकम' की नीति को ही पुष्ट करता है। लेकिन सरकार है कि इस नीति पर दो कदम आगे चलती है तो फिर दो-तीन कदम पीछे हो लेती है। ढाक के वही तीन पात। कोविड घटनाओं ने समाज और शासन को एक बड़ा सबक सिखाया है कि योग, ईश्वर केंद्रित अध्यात्म और भागवत धर्म (मानव धर्म) की सार्वभौमिक सूझ भारत का पूरी मानवता को शाश्वत उपहार है। इन्हीं मूल्यों के साथ आगे बढ्ने में भारत की भलाई है।
हिन्दुत्व एक स्थानबंधित संकल्पना होने के नाते कभी भी सफल नहीं हो सकता । पिछले तेरह सौ वर्षों से यह अवधारणा लगातार सिकुड़ती ही गयी स्थानवाची होने के नाते और इसके नेताओं की संकीर्ण सोच ने इसके साथ-साथ पूरे भारत को सिकोड़ता गया है। इस्लाम, इसाइयत, बुद्धिज़्म इसीलिए विश्व व्यापी हुए क्योंकि ये स्थानबंधित संकल्पनाएँ नहीं हैं। अतः हिन्दुत्व का परित्याग कर सनातन धर्म को अपनाना होगा, हठधर्मिता हरहाल में छोड़नी होगी। सनातन धर्म हिन्दुत्व का समानार्थी नहीं है और न ही यह सिक्ख, बौद्ध, जैन धर्मों का हिन्दुत्व के साथ समाहार है जैसा कि कुछ संकीर्ण मनोवृत्ति के लोग प्रचारित कर अपनी नेतागिरी चलाते हैं। महज कुछ समूहों या जातियों का प्रभुत्व बनाए रखने के लिए सनातन धर्म के नाम पर अंधविश्वासों, रूढ़ियों, रीति-रिवाजों या संस्थाओं को संरक्षण तथा (झूठी सतही और छद्म वैज्ञानिक सोच के साथ) बढ़ावा देने की प्रवृत्ति इनके सार्वभौमिक प्रचार-प्रसार की राह में गंभीर बाधाएं है ।
अभिमत (भाग 4: अध्याय-पौधे, पशु और मनुष्य) मैं उल्लिखित है,
'तीन धर्म हैं- पादप धर्म, पशु धर्म और मानव धर्म। भागवत धर्म मानव धर्म का दूसरा नाम है। भागवत धर्म में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच विभाजन जैसा कोई भेद नहीं है। यह धर्म सभी मनुष्यों के लिए है। यह वाद के आधार पर कोई भेद नहीं करता है- यह पूरी मानवता के लिए है। यह धर्म ही आदि धर्म या सनातन धर्म है। भागवत धर्म के चार पहलू हैं-विस्तार, रस या प्रवाह, सेवा और तद्स्थिति या सर्वोच्च स्थिति की प्राप्ति।'
कोरोना का बड़ा सबक है कि इस समय भारत ही नहीं दुनिया या के सभी मंदिरों, मस्जिदों, गिरिजाघरों, गुरुद्वारों आदि सभी धर्मस्थलों को चिकित्सालय, योग-व्यायाम केन्द्रों और ध्वनिरहित ध्यान केन्द्रों में परिवर्तित कर झगड़े और आतंकवाद की जड़ ही काट दी जाय। कोरोना संकट समाप्त होने के बाद कुछ बड़े उपयुक्त धर्मस्थलों को विद्यालयों में बदला जा सकता है।
प्रणालीगत मुद्दों को निपटाने में वैज्ञानिक और तर्कसंगत दृष्टिकोण का उपयोग किया जाना चाहिए । भाव-प्रवण अंधविश्वासी रूढ़िवादी प्राचीन गौरव के अहंकार में समस्त ऊर्जा विचलित कर व्यवस्था को अंततः कमजोर करते हैं। अगर हमारे पूर्वज पुष्पक विमान बनाने में सक्षम थे, तो उन्होंने सिर्फ एक ही विमान क्यों बनाया, लोकप्रिय उपयोग के लिए हजारों के बजाय ! फिर उन्होंने इस क्षमता को विलुप्त होने क्यों दिया? पूर्वजों की उच्च कल्पनाशक्ति को सिर्फ गपशप या मिथकों के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए, इन्हीं से आगे चलकर महान आविष्कार के मार्ग प्रशस्त हुए हैं। यह मानवजाति की अनूठी क्षमता है। लेकिन इस तरह की उच्च कल्पनाओं, सपनों और अंतर्ज्ञान की इतिहास के रूप में लेबलिंग स्वस्थ बात नहीं है । किसी भी पुराने ग्रंथ का अंधानुकरण आपदाकारी है क्योंकि कोई भी पुराना ग्रंथ हर स्थान, कल और व्यक्ति के लिए हमेशा सही नहीं होता और दुर्बलकारी जटिलताओं को बढ़ाने के लिए बाध्य है ।
राजनीतिक व्यवस्था को पेशेवर या पारिवारिक दलालों द्वारा नहीं बल्कि उच्चतर न्यायालयों, संस्थाओं और सैना के प्रबल समर्थन के साथ आध्यात्मिक नैतिकता के आधार पर चलाने के उपाए अपनाए जाने चाहिए जैसा कि मैंने मार्च और अप्रैल, २०२१ के अंकों में पहले विस्तार से उल्लेख किया है । किसी भी प्रणाली की वास्तविक और सुचारू प्रगति के लिए—तकनीकी क्षमता, अनुशासन, पथ और रणनीति की स्पष्ट सूझ-समझ दृष्टि--इन चार तत्वों की जरूरत है । दृष्टि शुद्ध और परिपूर्ण चेतना की ओर केंद्रित हो बढ़नी चाहिए, फिर लक्ष्य स्पष्ट समझ के साथ एकीकृत हो जाएगा, ऊर्जा का विचलन कम होगा, प्रगति कुशल और प्रभावी होगा।
1 comment:
तहकीकात डिजिटल मीडिया को भारत के ग्रामीण एवं अन्य पिछड़े क्षेत्रों में समाज के अंतिम पंक्ति में जीवन यापन कर रहे लोगों को एक मंच प्रदान करने के लिए निर्माण किया गया है ,जिसके माध्यम से समाज के शोषित ,वंचित ,गरीब,पिछड़े लोगों के साथ किसान ,व्यापारी ,प्रतिनिधि ,प्रतिभावान व्यक्तियों एवं विदेश में रह रहे लोगों को ग्राम पंचायत की कालम के माध्यम से एक साथ जोड़कर उन्हें एक विश्वसनीय मंच प्रदान किया जायेगा एवं उनकी आवाज को बुलंद किया जायेगा।
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