कृपा शंकर चौधरी
भारत में आरक्षण केवल सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में सीटों का बंटवारा नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, ऐतिहासिक वंचना और समान अवसर से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील विषय है। इसी कारण आरक्षण पर बहस होते ही समाज में भावनाएं भी उभरती हैं और राजनीतिक मतभेद भी। ऐसे समय में प्रभात रंजन सरकार द्वारा प्रतिपादित प्रगतिशील उपयोग तत्त्व—PROUT का आरक्षण संबंधी दृष्टिकोण एक अलग और विचारणीय दिशा प्रस्तुत करता है।
PROUT की मूल अवधारणा यह नहीं है कि किसी व्यक्ति को केवल उसके जन्म या जातीय पहचान के आधार पर प्राथमिकता मिले। इसके बजाय वास्तविक आर्थिक और शैक्षणिक वंचना को प्राथमिकता देने की बात कही गई है। प्रभात रंजन सरकार ने वर्तमान सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के लिए चार स्तर की प्राथमिकता का उल्लेख किया था—पहली प्राथमिकता गरीब पिछड़े परिवारों को, दूसरी गरीब गैर-पिछड़े परिवारों को, तीसरी गैर-गरीब पिछड़े परिवारों को और अंतिम प्राथमिकता गैर-गरीब गैर-पिछड़े परिवारों को। यहां “पिछड़ा” केवल जाति का पर्याय नहीं, बल्कि ऐसे परिवारों के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है जिन्हें अतीत में शिक्षा और सामाजिक सुविधाओं का पर्याप्त अवसर नहीं मिला।
यहीं से आरक्षण पर एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है—क्या किसी व्यक्ति की वर्तमान स्थिति का मूल्यांकन उसके परिवार की वास्तविक वंचना देखकर नहीं होना चाहिए?
मान लीजिए एक परिवार आर्थिक रूप से अत्यंत कमजोर है। माता-पिता अशिक्षित हैं, परिवार में किसी ने उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं की और कई पीढ़ियों से रोजगार के सीमित अवसर ही उपलब्ध रहे हैं। दूसरी ओर, उसी क्षेत्र में एक ऐसा परिवार है जिसे ऐतिहासिक रूप से पिछड़ा माना जाता है, लेकिन आज वह आर्थिक रूप से संपन्न है और उसके परिवार के कई सदस्य उच्च शिक्षा तथा सरकारी सेवाओं में स्थापित हैं। क्या दोनों परिवारों को अवसर देने की जरूरत समान है? PROUT इस प्रश्न का उत्तर वंचित व्यक्ति को अधिक प्राथमिकता देकर देने की कोशिश करता है।
इस दृष्टिकोण की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह गरीब सामान्य वर्ग के व्यक्ति को भी उपेक्षित नहीं करता। यदि गरीबी और अवसरों की कमी किसी व्यक्ति की वास्तविक बाधा है तो केवल उसकी जातीय पहचान के कारण उसे सहायता से बाहर नहीं किया जाना चाहिए। इसी प्रकार ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों के उन परिवारों को भी प्राथमिकता मिलनी चाहिए जो आज भी शिक्षा और आर्थिक अवसरों से पीछे हैं।
हालांकि यहां एक सावधानी भी जरूरी है। भारत में SC, ST और OBC आरक्षण का आधार केवल वर्तमान गरीबी नहीं है। इनके पीछे ऐतिहासिक सामाजिक और शैक्षणिक वंचना तथा प्रतिनिधित्व से जुड़े संवैधानिक उद्देश्य हैं। इसलिए PROUT के विचार को वर्तमान संवैधानिक आरक्षण व्यवस्था का सीधा विकल्प मानना उचित नहीं होगा। बल्कि इसे आरक्षण नीति के भीतर वास्तविक वंचित व्यक्ति तक लाभ पहुंचाने की दिशा में एक वैकल्पिक चिंतन के रूप में देखा जाना चाहिए।
PROUT का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है—आरक्षण को स्थायी व्यवस्था न मानना। प्रभात रंजन सरकार के विचार में जब तक समाज में आर्थिक और शैक्षणिक असमानता मौजूद है, तब तक पिछड़े लोगों के लिए विशेष प्रयास आवश्यक हैं। लेकिन ऐसी व्यवस्था का अंतिम लक्ष्य ऐसा समाज बनाना होना चाहिए जहां प्रत्येक व्यक्ति को शिक्षा, रोजगार और न्यूनतम आवश्यकताओं की गारंटी हो और किसी को अवसर पाने के लिए आरक्षण का सहारा लेने की आवश्यकता न पड़े।
यही बात वर्तमान आरक्षण बहस को एक नई दिशा दे सकती है।
आरक्षण का उद्देश्य कितने लोगों को आरक्षण देना है, यह नहीं होना चाहिए; बल्कि यह होना चाहिए कि आरक्षण की जरूरत आखिर कब तक रहेगी।
यदि किसी गरीब परिवार के बच्चे को अच्छी शिक्षा, पौष्टिक भोजन, स्वास्थ्य सुविधा, गुणवत्तापूर्ण विद्यालय और रोजगार का समान अवसर मिल जाए तो उसके लिए आरक्षण जीवन की अनिवार्यता नहीं रहेगा। इसलिए केवल आरक्षण की सीटें बढ़ाने की राजनीति के बजाय सरकारों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता पर अधिक ध्यान देना होगा।
PROUT की दृष्टि में पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए केवल आरक्षण पर्याप्त नहीं है। शिक्षा की असमानता दूर करना, ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि और सिंचाई की सुविधाएं बढ़ाना, छोटे एवं कुटीर उद्योगों को विकसित करना तथा परिवहन और संचार व्यवस्था को मजबूत करना भी आवश्यक है।
आज आवश्यकता ऐसी नीति की है जो सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय और अवसर की समानता—तीनों के बीच संतुलन बनाए।
आरक्षण पर बहस को ‘आरक्षण चाहिए या नहीं चाहिए’ की दो ध्रुवीय राजनीति से बाहर निकालकर यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए—
सबसे अधिक वंचित कौन है?
वह वंचित क्यों है?
उसे अवसर कैसे दिया जाए?
और ऐसी व्यवस्था कब बनेगी जब उसे विशेष अवसर की जरूरत ही न रहे?
यही प्रश्न PROUT के आरक्षण संबंधी चिंतन को आज भी प्रासंगिक बनाते हैं।
अंततः किसी भी आरक्षण नीति की सफलता इस बात से तय नहीं होनी चाहिए कि उसने कितनी सीटें बांटीं, बल्कि इससे होनी चाहिए कि उसने कितने वंचित परिवारों को आत्मनिर्भर बनाया।
न्याय का अर्थ केवल समान हिस्सा देना नहीं, बल्कि उस व्यक्ति तक अवसर पहुंचाना भी है जिसे उसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।
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