लेखक— आनंद किरण
आधुनिक आर्थिक विमर्श में जब भी किसी राष्ट्र की उन्नति का मापन होता है, तब 'सकल घरेलू उत्पाद' (GDP) को सर्वोच्च मानक मान लिया जाता है। हालिया आंकड़ों में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7.8% दर्ज की गई, जिसे आर्थिक महाशक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर, डेटा संशोधनों और आधार वर्ष की विसंगतियों के बीच 2.6% जैसी सांख्यिकीय बहसों और आम जनमानस की क्रय शक्ति में 'शून्य वास्तविक सुधार' जैसे यथार्थ ने इस सरकारी दावे पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
यह विरोधाभास इस मौलिक सत्य को बेनकाब करता है कि जीडीपी की वर्तमान अवधारणा मूलतः भ्रामक, एकांगी और आम नागरिक के जीवन स्तर से कटी हुई है। जब तक अर्थव्यवस्था को लाभ-केंद्रित सांख्यिकी से मुक्त कर जन-केंद्रित सिद्धांतों पर पुनर्गठित नहीं किया जाएगा, तब तक विकास का यह ढोल केवल मुट्ठी भर कॉर्पोरेट घरानों की समृद्धि का ही आवरण बना रहेगा।
जीडीपी की भ्रामकता: पूंजीवादी संकेंद्रण का सूचकांक
जीडीपी की मूल परिभाषा केवल किसी देश की सीमा के भीतर उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के कुल मौद्रिक मूल्य की गणना करती है। यह सूचकांक तीन मौलिक बिंदुओं पर पूर्णतः मौन रहता है:
1. धन का असमान वितरण: जीडीपी यह नहीं बताती कि उत्पादित धन किसके हाथों में केंद्रित हो रहा है। यदि देश के शीर्ष 1% लोग कुल संपत्ति का बड़ा हिस्सा डकार रहे हैं और शेष आबादी विपन्नता की ओर धकेली जा रही है, तब भी जीडीपी में उछाल दिखाई दे सकता है। यह 'K-Shaped Growth' का वीभत्स रूप है।
2. उत्पादन का उद्देश्य: जीडीपी की दृष्टि में एक विनाशकारी शस्त्र उद्योग, पर्यावरण को नष्ट करने वाला खनन और अनिवार्य जन-उपयोगी वस्तु का उत्पादन समान मौद्रिक मूल्य रखते हैं। यह मानवीय मूल्यों और सामाजिक आवश्यकताओं की उपेक्षा कर केवल बाजार के वित्तीय लेन-देन को मापती है।
3. असंगठित क्षेत्र की उपेक्षा: भारत में 90% से अधिक कार्यबल असंगठित (Informal) क्षेत्र में कार्यरत है। जीडीपी के आंकड़े मुख्यतः संगठित कॉर्पोरेट डेटा पर आधारित होते हैं, जिससे नोटबंदी, जीएसटी और मुद्रास्फीति की मार झेल रहे असंगठित क्षेत्र का आर्थिक ठहराव इन आंकड़ों के पीछे छिप जाता है।
प्रउत का क्रय शक्ति सिद्धांत: विकास का वास्तविक पैमाना
प्रगतिशील उपयोग तत्व (PROUT / प्रउत) के प्रणेता श्री प्रभात रंजन सरकार ने पूंजीवादी अर्थशास्त्र के इस मूलभूत दोष को पहचानते हुए 'क्रय शक्ति सिद्धांत' को वास्तविक प्रगति का मापदंड घोषित किया।
प्रउत के अनुसार, "किसी अर्थव्यवस्था की वास्तविक सफलता जीडीपी की दर से नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति की निरंतर बढ़ती क्रय शक्ति (Purchasing Power) और उसकी न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ण गारंटी से मापी जानी चाहिए।"
प्रउत के इस सिद्धांत के मुख्य स्तंभ निम्नलिखित हैं:
● न्यूनतम आवश्यकताओं की गारंटी: प्रत्येक नागरिक को जीवन की पाँच मूलभूत आवश्यकताओं—अन्न, वस्त्र, आवास, चिकित्सा और शिक्षा—की 100% उपलब्धता और उन्हें प्राप्त करने की क्रय शक्ति मिलनी चाहिए।
● क्रय शक्ति का निरंतर संवर्धन: केवल वस्तुओं का उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है; उत्पादन के साथ-साथ आम जनता की जेब में वास्तविक क्रय शक्ति पहुँचाना अनिवार्य है। यदि मुद्रास्फीति (Inflation) की दर आय वृद्धि से अधिक है, तो जीडीपी चाहे 10% ही क्यों न हो, आम नागरिक की वास्तविक क्रय शक्ति घटती ही है।
● असीमित संपत्ति के संचय पर रोक: जब तक व्यक्तिगत संपत्ति के असीमित संचय (Uncapped Accumulation of Wealth) पर संवैधानिक प्रतिबंध नहीं लगाया जाएगा, तब तक समाज के निचले हिस्से तक क्रय शक्ति का प्रवाह संभव नहीं है।
समाधान: विकेंद्रीकृत प्रउतवादी ढांचा
इस सांख्यिकीय भ्रम से निकलकर न्यायसंगत अर्थव्यवस्था के निर्माण के लिए प्रउत निम्नलिखित व्यावहारिक कदम प्रस्तुत करता है:
● ब्लॉक-स्तरीय विकेंद्रीकृत योजना (Block-Level Planning): केंद्रीय स्तर पर थोपी गई नीतियां केवल कॉर्पोरेट हितों की पूर्ति करती हैं। आर्थिक नियोजन की मूल इकाई 'ब्लॉक' होनी चाहिए, जहाँ स्थानीय संसाधनों का उपयोग स्थानीय लोगों की न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करने और 100% रोजगार सृजित करने के लिए किया जाए।
● सहकारी आधारित उत्पादन (Cooperative Economy): अर्थव्यवस्था का अधिकांश हिस्सा सहकारी समितियों के माध्यम से संचालित होना चाहिए। इससे उत्पादन का लाभांश पूंजीपतियों की जेब में जाने के बजाय सीधे उत्पादकों और श्रमिकों में वितरित होगा, जिससे उनकी क्रय शक्ति में वृद्धि होगी।
● स्थानीय सामाजिक-आर्थिक इकाइयां: सांस्कृतिक, भाषाई और भौगोलिक रूप से एकरूप क्षेत्रों को स्वदेशी 'सामाजिक-आर्थिक इकाइयों' के रूप में विकसित किया जाए, ताकि स्थानीय धन का पलायन बाहर न हो और स्थानीय अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भर बन सके।
निष्कर्ष
जीडीपी के 7.8% के आंकड़े केवल कॉर्पोरेट मुनाफे की कहानी कहते हैं, जबकि 2.6% की बहसें सांख्यिकीय कागजी कलाबाजियों को उजागर करती हैं। वास्तविक यथार्थ यह है कि आम जनता के जीवन स्तर में कोई ठोस गुणात्मक बदलाव नहीं आया है।
अब समय आ गया है कि हम जीडीपी के इस पूंजीवादी छलावे से बाहर निकलें। प्रगति का वास्तविक पैमाना सांख्यिकी के आंकड़ों का अंबार नहीं, बल्कि समाज के हर नागरिक के चेहरे पर छाई निश्चिंतता और उसकी मजबूत होती क्रय शक्ति होनी चाहिए। प्रउत का क्रय शक्ति सिद्धांत ही एक मात्र ऐसा विकल्प है जो अर्थव्यवस्था को कागजी विकास के जाल से निकालकर मानव-केन्द्रित और न्यायसंगत धरातल पर प्रतिष्ठित कर सकता है।
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