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Thursday, 3 September 2026

वैष्णव और गृहस्थ आश्रम इस बार एक साथ मनाएंगे श्रीकृष्ण जन्मोत्सव, 4 सितंबर को बनेगा दुर्लभ संयोग


उपेन्द्र कुमार पांडेय, आजमगढ़।

भगवान श्रीकृष्ण का जन्माष्टमी पर्व इस बार 4 सितंबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस वर्ष जन्माष्टमी का पर्व विशेष संयोग लेकर आ रहा है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस बार वैष्णव, स्मार्त गृहस्थ और औदायिक (रोहिणी नक्षत्र मतावलंबी) तीनों मतों को मानने वाले श्रद्धालु एक ही दिन भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाएंगे।

आचार्य दीपक शुक्ल के अनुसार जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिरों, मठों, आश्रमों और घरों में विशेष पूजा-अर्चना एवं भव्य आयोजन होंगे। रात 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के साथ ही चारों ओर उल्लास का वातावरण होगा और इसके बाद छह दिवसीय जन्मोत्सव कार्यक्रमों का शुभारंभ होगा।

अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का विशेष संयोग

आचार्य के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि इस बार 3 सितंबर की अर्धरात्रि के बाद 1:33 बजे प्रारंभ होगी। इसके करीब 48 मिनट पहले रोहिणी नक्षत्र रात 12:45 बजे से शुरू होगा।

रोहिणी नक्षत्र अगले दिन यानी शुक्रवार को रात 11:12 बजे तक रहेगा, जबकि अष्टमी तिथि रात 11:13 बजे तक रहेगी। ऐसे में 4 सितंबर को अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र की प्राप्ति होने के कारण स्मार्त, वैष्णव और औदायिक रोहिणी नक्षत्र मतावलंबी श्रद्धालु एक ही दिन जन्माष्टमी मनाएंगे।

शास्त्रों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। धर्मसिंधु में भी कहा गया है— 'भाद्र कृष्ण अष्टमी निशीथव्यापिनी ग्राह्या'। अर्थात निशीथकाल में अष्टमी तिथि व्याप्त होने पर उसी दिन जन्माष्टमी मनाने का विधान है।

ऐसे करें जन्माष्टमी पर पूजन

आचार्य दीपक शुक्ल के अनुसार श्रद्धालु रात 12 बजे बाल गोपाल का पंचामृत से अभिषेक कर पीले वस्त्र अर्पित करें। इसके बाद माखन-मिश्री का भोग लगाकर तुलसी दल अर्पित करें। 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का 108 बार जाप करना शुभ माना गया है।

श्रद्धालु श्रीमद्भगवद्गीता के एक-दो अध्याय का पाठ या श्रीकृष्ण नाम का संकीर्तन भी कर सकते हैं। अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को भोजन अथवा पीले वस्त्र दान करना तथा गाय को हरा चारा खिलाना भी पुण्यकारी माना गया है। विशेष मनोकामना के लिए संकल्प लेकर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने से श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।


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