भोजपुरी को संवैधानिक सम्मान: अस्मिता, संस्कृति और अधिकार की लड़ाई - Tahkikat News

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Wednesday, 2 September 2026

भोजपुरी को संवैधानिक सम्मान: अस्मिता, संस्कृति और अधिकार की लड़ाई


भोजपुरी केवल बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की भावनाओं, संस्कारों, लोकपरंपराओं और जीवन-पद्धति की जीवंत पहचान है। यह एक स्वतंत्र, समृद्ध और पूर्ण भाषा है, जिसकी मिठास और अपनापन भारत की सीमाओं से निकलकर दुनिया के अनेक देशों तक पहुंच चुका है। इसके बावजूद आज भी भोजपुरी भाषा अपने ही देश में संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान पाने की प्रतीक्षा कर रही है।

भोजपुरी भारत के विशाल भू-भाग में करोड़ों लोगों द्वारा बोली और समझी जाती है। बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड सहित देश के विभिन्न हिस्सों में भोजपुरी जनजीवन की आत्मा से जुड़ी हुई है। इतना ही नहीं, रोजगार और प्रवास के कारण भोजपुरी की पहुंच भारत की सीमाओं से बाहर मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद-टोबैगो सहित कई देशों तक हुई है। भोजपुरी ने भारतीय संस्कृति और परंपरा को विश्व पटल पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

भाषा का सम्मान, समाज का सम्मान

किसी भाषा को संवैधानिक मान्यता मिलना केवल सरकारी कागज पर दर्ज होने की प्रक्रिया नहीं होती। भाषा के साथ उस भाषा को बोलने वाले समाज का इतिहास, संस्कृति, साहित्य और अस्मिता जुड़ी होती है। इसलिए भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग वास्तव में करोड़ों भोजपुरी भाषियों के सम्मान, सांस्कृतिक अधिकार और संवैधानिक समानता की मांग है।

भोजपुरी की अपनी समृद्ध साहित्यिक परंपरा है। लोकगीतों, लोकनाट्य, बिरहा, कजरी, सोहर, चैता, फगुआ और लोककथाओं ने पीढ़ियों से समाज को जोड़ने का काम किया है। छठ जैसे लोकपर्वों की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति में भी भोजपुरी का विशेष स्थान है। भोजपुरी की मिठास में गांव की मिट्टी की खुशबू, रिश्तों की आत्मीयता और लोकजीवन की सादगी महसूस होती है।

भोजपुरी पुनर्जागरण मंच का जनजागरण अभियान

भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने के उद्देश्य से भोजपुरी पुनर्जागरण मंच द्वारा जनजागरण अभियान तेज किया जा रहा है। अभियान को विभिन्न क्षेत्रों में लोगों का समर्थन मिल रहा है। यह प्रयास केवल किसी संगठन का अभियान न रहकर जन-जन की आवाज बने, यही समय की मांग है।

भोजपुरी समाज के बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों, शिक्षकों, कलाकारों, युवाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों को इस विषय पर गंभीरता से आगे आने की आवश्यकता है। सोशल मीडिया से लेकर गांव की चौपाल तक भोजपुरी के संवैधानिक अधिकार की चर्चा होनी चाहिए।

नई पीढ़ी तक पहुंचे भोजपुरी की विरासत

आज सबसे बड़ी चुनौती यह भी है कि हमारी नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा को केवल घर की बातचीत तक सीमित न समझे। भोजपुरी में पढ़ना, लिखना, साहित्य सृजन करना और उसके गौरवपूर्ण इतिहास को जानना भी जरूरी है। यदि भाषा का संरक्षण करना है तो उसे अगली पीढ़ी तक सम्मान के साथ पहुंचाना होगा।

भोजपुरी को सम्मान देने का अर्थ किसी दूसरी भाषा का विरोध करना नहीं है। भारत की खूबसूरती ही इसकी भाषाई विविधता में है। हिंदी, भोजपुरी, अवधी, मैथिली, मगही, ब्रज, बुंदेली और देश की तमाम भाषाएं भारतीय संस्कृति के विशाल वृक्ष की अलग-अलग शाखाएं हैं। हर भाषा का सम्मान भारत की सांस्कृतिक शक्ति को और मजबूत करता है।

अब आवाज उठाने का समय है

भोजपुरी हमारी अस्मिता है, हमारी पहचान है, हमारी संस्कृति है और हमारी पीढ़ियों की विरासत है। इसे संवैधानिक सम्मान दिलाने का प्रयास किसी एक व्यक्ति या संगठन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक भोजपुरी भाषी व्यक्ति का सामाजिक और सांस्कृतिक दायित्व है।

आइए, हम भोजपुरी के सम्मान की इस मुहिम से जुड़ें। अपने परिवार, समाज और नई पीढ़ी को भोजपुरी की समृद्ध विरासत से जोड़ें और लोकतांत्रिक एवं शांतिपूर्ण तरीके से भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग को मजबूत करें।

भोजपुरी का सम्मान, भोजपुरी समाज का सम्मान है।
भोजपुरी की पहचान, हमारी अपनी पहचान है।
आइए, मिलकर आवाज उठाएं—भोजपुरी को संवैधानिक सम्मान दिलाएं।

प्रो. भृगुनाथ प्रसाद
प्रमुख, मार्गदर्शक मंडल
जिला इकाई, सिवान
भोजपुरी पुनर्जागरण मंच

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